अध्याय २७

श्री पुरुषोत्तम मास में बुद्धि पूर्वक अथवा अबुद्धि पूर्वक किसी भी बहाने यदि उपवास, स्नान, दान और जप आदि किया जाय तो करोड़ों जन्म पर्यन्त किये पाप नष्ट हो जाते हैं। जैसे दुष्ट बन्दर ने अबुद्धि पूर्वक तीन रात तक पुरुषोत्तम मास में केवल स्नान कर लिया तो उसके पूर्व जन्म के समस्त कुकर्मों का नाश हो गया ॥ २५-२६-२७ ॥

व्याजतोऽपि कृते तस्मिन्मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ उपवासेन दानेन स्नानेन च जपादिना ॥ २५ ॥

कोटिजन्मकृतानेकपापराशिर्लयं व्रजेत्‌ ॥ यथाशाखामृगस्याशु त्रिरात्रस्नानमात्रतः ॥ २६ ॥

अजानतोपि दुष्टस्य प्राक्तनानां कुकर्मणाम्‌ ॥ संचयो विलयं यातो मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ २७ ॥

सोऽपि दिव्यं वपुर्धृत्वा विमानमधिरुह्य च ॥ अगमद्दिव्यगोलोकं जरामृत्युविवर्जितम्‌ ॥ २८ ॥

अतः श्रेष्ठतमो मासः सर्वेभ्यः पुरुषोत्तमः ॥ दुष्टं शाखामृगं योऽसौ व्याजेनापि हरि नयेत्‌ ॥ २९ ॥

अहो मूढा न सेवन्ते मासं श्रीपुरुषोत्तमम्‌ ॥ ते धन्याः कृतकृत्यास्ते तेषां च सफलो भवः ॥ ३० ॥

और वह बन्दर भी दिव्य शरीर धारण कर विमान पर चढ़कर जरामरण रहित गोलोक को प्राप्त हुआ ॥ २८ ॥

इसलिये यह पुरुषोत्तम मास संपूर्ण मासों में अत्यन्त श्रेष्ठ मास है क्योंकि इसने बिना जाने से ही पुरुषोत्तम मास में किये गये स्नानमात्र से दुष्ट वानर को हरि भगवान्‌ के समीप पहुँचाया ॥ २९ ॥

अहो आश्च र्य है! श्रीपुरुषोत्तम मास का सेवन जो नहीं करनेवाले हैं वे महामूर्ख हैं। वे धन्य हैं और कृतकृत्य हैं तथा उनका जन्म सफल है ॥ ३० ॥

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