अध्याय २७

जो पुरुष श्रीपुरुषोत्तम मास का विधि के साथ स्नान, दान, जप, हवन, उपवासपूर्वक सेवन करते हैं ॥ ३१ ॥

नारद मुनि बोले – वेद में समस्त अर्थों का साधन करनेवाला मनुष्य शरीर कहा गया है। परन्तु यह वानर भी व्याज से पुरुषोत्तम मास का सेवन कर साक्षात्‌ मुक्त हो गया ॥ ३२ ॥

हे तपोनिधे! संपूर्ण प्राणियों के कल्याण के निमित्त मुझसे इस कथा को कहिये। इस वानर ने तीन रात्रि तक स्नान कहाँ पर किया? ॥ ३३ ॥

पुरुषोत्तममासं ये सेवन्ते विधिपूर्वकम्‌ ॥ स्नानदानजपैर्होमैरुपोषणपुरः सरैः ॥ ३१ ॥

नारद उवाच ॥ सर्वार्थसाधनं वेदे मानुषं जनुरुच्यते ॥ अयं शाखामृगोऽप्यद्धा मुक्तो यद्‌व्याजसेवनात्‌ ॥ ३२ ॥

तद्वदस्व कथामेतां सर्वलोकहिताय मे ॥ कुत्रासौ कृतवान्‌ स्नानं त्रिरात्रं तपसां निधे ॥ ३३ ॥

कोऽसौ कपिः किमाहारः कुत्र जातः क्क चावसत्‌ ॥ व्याजेन तस्य किं पुण्यं जातं श्रीपुरुषोत्तमे ॥ ३४ ॥

तत्सर्वं विस्तरेणैव मह्यं शुश्रूषवे वद ॥ न तृप्तिर्जायते त्वत्तः श्रृण्वतो मे कथामृतम्‌ ॥ ३५ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ कश्चित्केरलदेशीयो द्विजः परमलोलुपः ॥ नित्यं धनचये दक्षः सरघेव धनप्रियः ॥ ३६ ॥

यह वानर कौन था? आहार क्या करता था? उत्पन्न कहाँ हुआ? कहाँ रहता था? और श्रीपुरुषोत्तम मास में व्याज से उसको क्या पुण्य हुआ? ॥ ३४ ॥

यह सब विस्तार से सुनने की इच्छा करने वाले मेरे से कहिये। आप से कथामृत श्रवण करते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती है ॥ ३५ ॥

श्रीनारायण बोले – कोई केरल देश का अत्यन्त लालची, शहद की मक्खियों के समान धन में प्रेम रखनेवाला, सर्वदा धन के संचय करने में तत्पर रहनेवाला ब्राह्मण था ॥ ३६ ॥

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