अध्याय २७

उसी कर्म से लोक में कदर्यनाम से प्रसिद्ध था। उसके पिता ने भी प्रथम उसका नाम चित्रशर्म्मा रक्खा था ॥ ३७ ॥

उस कदर्य ने सुन्दर अन्न, सुन्दर वस्त्र का किसी समय उपभोग नहीं किया। उस कुबुद्धि ने अग्नि में आहुति, पितरों का श्राद्ध भी नहीं किया ॥ ३८ ॥

यश के लिये कुछ नहीं किया और आश्रित वर्ग का पोषण नहीं किया। अन्याय से धन को इकट्‌ठा कर पृथिवी में गाड़ दिया ॥ ३९ ॥

लोके कदर्य इत्याख्यां गतस्तेनैव कर्मणा ॥ चित्रशर्मा पुरा नाम तस्यासीत्पितृकल्पितम्‌ ॥ ३७ ॥

सदन्नं च सुवस्त्रं च न भुक्तंण तेन कुत्रचित्‌ ॥ न स्वाहा न स्वधा वापि कृता तेन कुबुद्धिना ॥ ३८ ॥

यशाऽर्थे न कृतं किञ्चित्पोष्यवर्गो न पोषितः ॥ सर्वं भूमिगतं च क्रे धनमन्यायसञ्चितम्‌ ॥ ३९ ॥

न माघे तिलदानं च कृतं तेन कदाचन ॥ कार्तिके दीपदानं च ब्राह्मणानां च भोजनम्‌ ॥ ४० ॥

वैशाखे धान्यदानं च व्यतीपाते च काञ्चनम्‌ ॥ वैधृतौ राजतं दानं सर्वदानान्यमूनि च ॥ ४१ ॥

रविसंक्रमणे काले न दत्तानि कदाचन ॥ चन्द्रसूर्योपरागे च न जप्तंव न हुतं क्कचित्‌ ॥ ४२ ॥

माघमास में उसने कभी तिलदान नहीं किया। कार्तिक मास में दीपदान और ब्राह्मणों को भोजन नहीं कराया ॥ ४० ॥

वैशाख मास में धान्य का दान नहीं किया और व्यतीतपात योग में सुवर्ण का दान नहीं किया। वैधृति योग में चाँदी का दान नहीं किया और ये सब दान ॥ ४१ ॥

कभी सूर्य संक्रान्ति काल में नहीं दिया। चन्द्रग्रहण-सूर्यग्रहण के समय न जप किया और न अग्नि में आहुति दी ॥ ४२ ॥

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