अध्याय २७

सर्वत्र नेत्रों में आँसू भरकर दीन वचन कहा करता था। वर्षा, वायु, आतप से दुःखित, दुबला और काले शरीर वाला वह मूर्ख ॥ ४३ ॥

सर्वदा धन के लोभ से पृथिवी पर घूमा करता था। ‘कोई भी इस पामर को कुछ दे देता’ इस तरह बार-बार कहता हुआ ॥ ४४ ॥

गौ के दोहन समय तक कहीं भी ठहरने में असमर्थ था। लोक के प्राणियों के धिक्काररने से जला हुआ और उद्विग्ना मन होकर घूमता था ॥ ४५ ॥

अवीवदद्दीनवाचं सर्वत्राश्रुपरिप्लुतः ॥ वर्षवातातपक्लिष्टः कृशः श्यामकलेवरः ॥ ४३ ॥

चचार धनलोभेन मूढधीर्भूतले सदा ॥ कोऽपि यच्छतु यत्किञ्चित्पामराय मुहुर्वदन्‌ ॥ ४४ ॥

स गोदोहनमात्रं हि कुत्रापि स्थातुमक्षमः ॥ लोकधिक्काषरसंदग्धो बभ्रामोद्विग्नमानसः ॥ ४५ ॥

तन्मित्रं वाटिकानाथः कश्चिदासोद्वनेचरः व स तं निवेदयामास स्वदुःखं संरुदन्मुहुः ॥ ४६ ॥

तिरस्कुर्वन्ति मां नित्यं पुटभेदनवासिनः ॥ अतस्तत्र मया स्थातुं न शक्यं पुटभेदने ॥ ४७ ॥

इत्येवं वदतस्तस्य कदर्यस्य द्विजन्मनः ॥ अतिदीनतरां वाचमाकर्ण्य कृपयाऽलुतः ॥ ४८ ॥

उसका मित्र कोई बनेचर बाटिका का मालिक था। उस कदर्य ने उस माली से बार-बार रोते हुए अपने दुख को कहा ॥ ४६ ॥

नगर के वासी मेरा नित्य तिरस्कार करते हैं इसलिये उस नगर में मैं नहीं रह सकता हँ ॥ ४७ ॥

इस प्रकार कहते हुए उस कदर्य ब्राह्मण के अत्यन्त दीन वचन को सुन कर माली दयार्द्र चित्त हो गया ॥ ४८ ॥

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