अध्याय २७

शरण में आये हुए उस दीन ब्राह्मण पर माली ने दया कर कहा कि हे कदर्य! इस समय तुम इसी वाटिका में वास करो ॥ ४९ ॥

नगरवासियों से तिरस्कृत हुआ वह कदर्य उस माली के वचन को सुन प्रसन्न होकर उस वाटिका में रहने लगा ॥ ५० ॥

नित्य उस माली के पास वास करता और उसकी आज्ञा का पालन करता था। इसलिये उस कदर्य में माली ने दृढ़ विश्वाउस किया ॥ ५१ ॥

मालाकारः प्रपन्नं तं दीनं मत्वाऽकरोद्दयाम्‌ ॥ हे कदर्य त्वमत्रैव वाटिकायां वसाऽधुना ॥ ४९ ॥

मालाकारवचः श्रुत्वा कदर्यः सर्वनागरैः ॥ तिरस्कृतः स तद्वाटीमध्युवास मुदा युतः ॥ ५० ॥

नित्यं तन्निकटस्थायी तदाज्ञापरिपालकः ॥ तेन वाटीपतिस्तस्मिन्विश्वादसमकरोद्‌दृढम्‌ ॥ ५१ ॥

अतिविश्वस्तचित्तेन तस्मिन्‌ स वाटिकापतिः ॥ तमेवाचीकरद्विप्रं स्वकल्पं वाटिकापतिम्‌ ॥ ५२ ॥

ततः सर्वात्मभावेन ममायमिति निश्चयात्‌ ॥ विहाय वाटिकाचिन्तां सिषेवे राजमान्दरम्‌ ॥ ५३ ॥

राजद्वारे सदा कार्यं तस्यात्यन्तमबीभवत्‌ ॥ पराधीनतया चासौ वाटिकां न जगाम ह ॥ ५४ ॥

और उस कदर्य में अत्यन्त विश्वायस होने के कारण माली ने उस कदर्य ब्राह्मण को अपने से छोटा बगीचे का मालिक बना दिया ॥ ५२ ॥

इसके बाद उस माली ने यह निश्चय किया कि कदर्य हमारा आदमी है। इसलिये वाटिका की चिन्ता को छोड़कर राजमन्दिर का सेवन किया ॥ ५३ ॥

राजा के यहाँ उस माली को बहुत कार्य रहता था इसलिए और पराधीनतावश वाटिका की ओर वह कभी नहीं आया ॥ ५४ ॥

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