अध्याय २८

श्रीनारायण बोले – चित्रगुप्त धर्मराज के वचन को सुनकर अपने योद्धाओं से बोले – यह कदर्य प्रथम बहुत समय तक अत्यन्त लोभ से ग्रस्त हुआ, बाद चोरी करना शुरू किया ॥ १ ॥

इसलिये यह प्रथम प्रेतशरीर को प्राप्त कर बाद वानर शरीर में जाय, तब हम इसको बहुत-सी नरकयातना देंगे ॥ २ ॥

हे भट लोग! धर्मराज के गृह में यही क्रम श्रेष्ठ है। इस प्रकार चित्रगुप्त से आज्ञा प्राप्त होने पर भयंकर ॥ ३ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ तन्निशम्य भटानाह चित्रगुप्तश्चिरं भृशम्‌ ॥ पूर्वं लोभाभिभूतोऽयं पश्चाचौर्यमचीकरत्‌ ॥ १ ॥

अतः प्रेतत्वमासाद्य पश्चाद्भवतु वानरः ॥ ततश्चातहं प्रदास्यामि बह्वीं नरकयातनाम्‌ ॥ २ ॥

अयमेव क्रमः श्रेयान्‌ धर्मराजगृहे भटाः ॥ इत्येवं चित्रगुप्तेिन समादिष्टा विभीषणाः ॥ ३ ॥

तथा चक्रुर्भटाः शीघ्रं ताडयन्तश्चर तं द्विजम्‌ ॥ प्रेतत्वं प्रापितः पूर्वं कानने विफले द्विजः ॥ ४ ॥

निर्जले बहुकालं च प्रेतयोनिमवाप्य सः ॥ क्षुत्तृड्‌भ्यां व्याकुलोऽत्यन्तं बभ्राम गहने वने ॥ ५ ॥

प्रेतयोनिगतं दुःखमनुभूय ततः परम्‌ ॥ फलचौर्यसमुद्‌भूतां कपियोनिमजीगमत्‌ ॥ ६ ॥

भट लोगों ने चित्रगुप्त की आज्ञानुसार शीघ्र वैसा ही किया और उस ब्राह्मण को पीटते हुए प्रथम प्रेतशरीर में करके फलरहित वन में रक्खा ॥ ४ ॥

वह ब्राह्मण प्रेत योनि को प्राप्त कर उस निर्जन गहन वन में क्षुधा-तृषा से अत्यन्त व्याकुल होकर भ्रमण करने लगा ॥ ५ ॥

प्रेतयोनि में होनेवाले दुःख को भोग कर बाद फलों के चोरी करने से होने वाली वानर योनि को गया ॥ ६ ॥

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