अध्याय २८

एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाता हुआ मृत्यु को सुख देनेवाला मानने लगा। किसी समय पृथिवी पर गिर पड़ा और अत्यन्त दुःखित हो विलाप करने लगा ॥ ५५ ॥

शरीर के टूट जाने से जलहीन मछली के समान तड़फड़ाता हुआ रोदन करने लगा। शिथिल शरीर वाला, गलित मुखवाला वह वानर भूख-प्यास से पीड़ित हो गया ॥ ५६ ॥

उसके समस्त दांत मुखरोग से पीड़ित होकर गिर गये। पूर्व जन्म के कृत पाप से इस तरह दुःख को प्राप्त हुआ ॥ ५७ ॥

वृक्षाद्‌वृक्षान्तरं गच्छन्‌ मेने मृत्युं सुखावहम्‌ ॥ कदाचिदपतद्भूमौ विललापातिदुःखितः ॥ ५५ ॥

अरूरुदद्भग्नगात्रो नीरभ्रष्टो यथा झषः ॥ असौ क्षुत्तृट्‌समाविष्टः श्ल थदेहो गलन्मुखः ॥ ५६ ॥

पेतुर्दन्तास्तथा सर्वे व्रणरोगेण पीडिताः ॥ पूर्वजन्मकृतात्‌ पापादेवं दुःखमजीगमत्‌ ॥ ५७ ॥

एवं प्रवर्त्तमानस्य निराहारस्य नित्यशः ॥ दैवयोगात्‌ समागच्छन्मासः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ ५८ ॥

तस्मिन्नपि तथैवास्ते शीतवातादिपीडितः ॥ कदाचिद्‌ बहुले पक्षे विचरन्‌ गहने वने ॥ ५९ ॥

तृषितःकुण्डनिकटैनाशक्नोत्‌ पातुममृतम्‌ ॥ क्षुधाविष्टोऽपिचापल्यात्तत्रोच्चैेर्वृक्षमारुहत्‌ ॥ ६० ॥

इस प्रकार नित्यप्रति निराहार रहते हुए वानर को देवयोग से श्रीपुरुषोत्तम मास आया ॥ ५८ ॥

उस पुरुषोत्तम मास में भी उसी प्रकार शीतवात आदि से पीड़ित रहा। किसी समय बहुल पक्ष में गहन वन में विचरण करता हुआ ॥ ५९ ॥

प्यासा वानर कुण्ड के पास पहुँचने पर भी जलपान करने को समर्थ नहीं हुआ, भूख से युक्त भी चपलता से वहाँ ऊँचे वृक्ष के ऊपर चढ़ गया ॥ ६० ॥

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