अध्याय २८

एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाते हुए उसके बीच में एक कुण्ड आ पड़ा। बहुत दिनों से निराहार शिथिल इन्द्रिय और जर्जर शरीर वाला ॥ ६१ ॥

निर्बल, शिथिल प्राणवाला कुण्ड के तटभाग में आया। इस प्रकार दशमी तिथि से चार दिन तक वानर को ॥ ६२ ॥

श्रीपुरुषोत्तम मास में उस कुण्ड में लोट-पोट करते बीत गये। पाँचवे दिन के आनेपर मध्याह्न काल में ॥ ६३ ॥

वृक्षाद्‌वृक्षान्तरं गच्छन्मध्ये कुण्डमपीपतत्‌ ॥ स चिराय निराहारः शिथिलेन्द्रियजर्जरः ॥ ६१ ॥

निर्बलःशिथिलप्राणःकुण्डप्रान्तमुपाश्रितः ॥ एवं दिनानि चत्वारि दशमीदिनतः कपेः ॥ ६२ ॥

गतानि लुण्ठतः कुण्डे मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ पञ्चमे दिवसे प्राप्ते मध्यंदिनगते रवौ ॥ ६३ ॥

व्यसुः पपात तत्तीथें तोयक्लिन्नवपुः कपिः ॥ स तं देहं समुत्सृज्य विनिर्धूतमलाशयः ॥ ६४ ॥

सद्यो दिव्यवपुः प्रापः दिव्याभरणभूषितम्‌ ॥ इन्दीवरदलश्यामं कोटिकन्दर्पसुन्दरम्‌ ॥ ६५ ॥

स्फुरद्रत्नवकिरीटं च सुचारुझषकुण्डलम्‌ ॥ लसत्पीतपटं पुण्यं सद्रत्नमकटिमेखलम्‌ ॥ ६६ ॥

उस तीर्थ में जल से भींगा शरीरवाला वानर प्राण से रहित होकर गिर गया और वह उस देह को त्याग कर पापों से रहित होकर ॥ ६४ ॥

तत्काल दिव्य आभूषणों से भूषित दिव्य देह को प्राप्त किया जो कि नीलकमल के दल के समान श्यामवर्ण, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर ॥ ६५ ॥

चमकते हुए रत्नों  से जटित किरीटधारी, सुन्दर शोभमान मत्स्यकुण्डल वाला, शोभमान पवित्र पीतवस्त्रधारी, कमर में रत्नोंर से जटित मेखला वाला ॥ ६६ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13