अध्याय २८

शोभमान बाजूबन्द, कंकण, अँगूठी, हार से शोभित, नीलवर्ण के टेढ़े चिकने बालों से आवृत सुन्दर मुख था ॥ ६७ ॥

उसी समय शीघ्र वहाँ वैष्णवों से युक्त विमान आया जिसमें भेरी, मृदंग, पटह, वेणु, वीणा का महान्‌ शब्द हो रहा है ॥ ६८ ॥

और देवांगनाओं का नाच हो रहा है, गन्धर्व किन्नर के सुन्दर गान हो रहे हैं ऐसे उस विमान को महाभाग दिव्यदेहधारी वानर देखकर ॥ ६९ ॥

लसत्केयूरवलयं मुद्रिकाहारशोभितम्‌ ॥ नीलकुञ्चितसुस्निग्धचिकुरावृतसन्मुखम्‌ ॥ ६७ ॥

तदानीमागमच्छीघ्रं विमानं वैष्णवाश्रितम्‌ ॥ भेरीमृदङ्गपटहवेणुवीणाबृहत्स्वनम्‌ ॥ ६८ ॥

नृत्यद्‌देवाङ्गनं दिव्यं गायद्‌गन्धर्वकिन्नरम्‌ ॥ तन्निरीक्ष्य महाभागो दिव्यदेहधरः कपिः ॥ ६९ ॥

विस्मयं परमं यातो महापापस्य मे कुतः ॥ एतत्पुण्यतमस्यैव योग्यं वैमानिकं सुखम्‌ ॥ ७० ॥

अथ काचित्तदुपरि दधारच्छत्रमिन्दुभम्‌ ॥ चक्रतुश्चाममरे तस्य काश्चि द्‌प्सरसरसो मुदा ॥ ७१ ॥

काश्चित्ताम्बूलहस्ताश्च काश्चित्‌ ननृतुश्चाप्सराः ॥ काचिद्‌भृङ्गारकं हैमं स्वर्धुनीवारिसम्भृतम्‌ ॥ ७२ ॥

अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हो कहने लगा कि पातकी मेरे को यह सुख कैसे हुआ? यह विमान-सुख बड़े पुण्यात्मा को ही होना उचित है ॥ ७० ॥

इसके बाद कोई देवांगना उसके ऊपर चन्द्रमा के समान श्वेकत छत्र को धारण करती हुई। कोई दो अप्सरायें हर्ष से उसको दोनों तरफ चामर को डुला रही हैं ॥ ७१ ॥

कोई पान हाथ में लिये खड़ी है और उसके सामने अप्सरायें नाच कर रही हैं। कोई गंगाजल से भरी हुई झारी को लिये खड़ी है ॥ ७२ ॥

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