अध्याय २८

कोई उसके सामने खड़ी गाने बजाने में तत्पर हैं। इस प्रकार उस वैभव को देखकर चित्र में बने हुए मे समान निश्च ल हो गया ॥ ७३ ॥

यह क्या है? मुझ दुष्ट पातकी को किस पुण्य से यह सब प्राप्त हुआ, मेरा कुछ भी पुण्य नहीं है जिसमें मैं हरि भगवान्‌ के परम पद को जाऊँ ॥ ७४ ॥

हस्ते कृत्वा पुरस्तस्थौ गीतावाद्यादितत्पराः ॥ एवं वैभवमालोक्य चित्रन्यस्त इवाभवत्‌ ॥ ७३ ॥

किमेतत्‌ केन पुण्येन ममापुण्यस्य दुर्मतेः ॥ नास्ति मे सुकृतं किञ्चिद्येन यामि हरेः पदम्‌ ॥ ७४ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्थं तर्कयतो बृहत्सुखनिधिं दिव्यं विमानं पुरो दृष्ट्वा विस्मितचेतसो हरिभटौ ज्ञात्वास्य हार्दं परम्‌ ॥ बद्‌ध्वाग्रे करसम्पुटं सविनयं नत्वा तदीयं पदं वाक्यं सुन्दरम्‌चतुः कपिजनुस्त्यक्त्वा पुरः संस्थितम्‌ ॥ ७५ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे कदर्योपाख्याने कपिजन्मनि विमानागमनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार तर्क करते हुए कदर्य ने सुख का बहुत बड़ा खजाना दिव्य विमान को सामने देखकर आश्चनर्य किया। बाद हरिभटों ने उस कदर्य का हार्दिक अभिप्राय जानकर उसके सामने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर उसके चरणों में नमस्कार कर वानरशरीर को त्यागे हुए उस कदर्य को सुन्दर वचन कहा ॥ ७५ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे श्रीपुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे कदर्योपाख्याने कपिजन्मनि विमानगमनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13