अध्याय २८

सुन्दर शीतल जल और छाया तथा फल-पुष्प से युक्त जम्बू खण्ड के मनोहर सुन्दर कालञ्जोर पर्वत पर ॥ ७ ॥

वहाँ इन्द्र से बनाया हुआ उत्तम कुण्ड है। मानसरोवर के समान पवित्र, सत्पुरुषों से सेवित, पापों का नाश करने वाला ॥ ८ ॥

देवताओं को भी दुर्लभ ‘मृगतीर्थ’ नाम से प्रसिद्ध था। जिसमें श्राद्ध करने से पितर लोग सद्‌गति को चले जाते हैं ॥ ९ ॥

दिव्ये कालञ्ज रे शैले जम्बुखण्डमनोहरे ॥ सुशीतलजलच्छाये फलपुष्पसमन्विते ॥ ७ ॥

तत्रासीद्देवराजेन निर्मितं कुण्डमुत्तमम्‌ ॥ सरोवरसमं पुण्यं सत्सेव्यं पापनाशनम्‌ ॥ ८ ॥

मृगतीर्थमिति ख्यातं सुराणामपि दुर्लभम्‌ ॥ यस्मिन्‌ कृतेन श्राद्धेन पितरो यान्ति सद्गतिम्‌ ॥ ९ ॥

तत्र दैत्यभयाद्देवा मृगा भूत्वा निरन्तरम्‌ ॥ अभिसस्नुर्निरातङ्का मृगतीर्थमतो विदुः ॥ १० ॥

तत्रायं प्रथमं जन्म कापेयं लब्धवान्‌ द्विजः ॥ फलचौर्यकृतात्‌ पापादासाद्य मानुषीं तनुम्‌‌ ॥ ११ ॥

नारद उवाच ॥ त्रैलोक्यपावने रम्ये मृगतीर्थे कथं कपिः ॥ आवासमकरोद्‌दुष्टः पापकोटिसमन्वितः ॥ १२ ॥

वहाँ पर देवता लोग दैत्यों के भय से मृग होकर निरन्तर, निर्भय स्नान करने लगे। इसलिये विद्वान्‌ लोग उस कुण्ड को मृगतीर्थ कहते हैं ॥ १० ॥

मनुष्य शरीर को प्राप्त कर यह ब्राह्मण वहाँ पर फलों के चोरी करने के पाप से प्रथम वानर शरीर को प्राप्त हुआ ॥ ११ ॥

नारद  मुनि बोले – त्रैलोक्य को पवित्र करने वाले रमणीय मृगतीर्थ में पापकोटि से युक्त वह दुष्ट वानर कैसे वास करता हुआ? ॥ १२ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13