अध्याय २८

हे नाथ! हे तपोधन! मेरे मन के सन्देह को काटो। क्योंकि आपके समान गुरुजनों का अपने शिष्यों के विषय में कभी भी गोप्य  नहीं होता है ॥ १३ ॥

सूतजी बोले – हे विप्रलोग! इस प्रकार नारद मुनि से प्रेरित होने पर अत्यन्त प्रसन्न तपोनिधि नारायण भगवान्‌ नारद मुनि का सत्कार करते हुए बोले ॥ १४ ॥

श्रीनारायण बोले – कोई चित्रकुण्डल नाम का महान्‌ वैश्य था। पतिव्रत धर्म में परायणा तारका नाम की उस वैश्य की स्त्री थी ॥ १५ ॥

छिन्धि मे संशयं नाथ तपोधन मनोगतम्‌ ॥ भवादृशां न गोप्यं हि स्वशिष्येषु कदाचन ॥ १३ ॥

सूत उवाच ॥ एवं सन्नोदितां विप्रा नारदेन तपोनिधिः ॥ उवाच परमप्रीतः सत्कुर्वन्नारदं मुनिम्‌ ॥ १४ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ कश्चिवैश्यो महानासीन्नाम्ना वै चित्रकुण्डलः ॥ तत्पत्नीत तारका नाम्नी पातिव्रत्यपरायणा ॥ १५ ॥

तावुभौ चक्रतुर्भक्त्या पुण्यं श्रीपुरुषोत्तमम्‌ ॥ तयोः कृतवतोर्मासो गतः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ १६ ॥

चरमेऽहनि सम्प्राप्तेप उद्यापनमथाकरोत्‌ ॥ सपत्नीको मुदा युक्तः श्रद्धया चित्रकुण्डलः ॥ १७ ॥

द्विजानाकारयामास वेदवेदाङ्गपारगान्‌ ॥ उद्यापनविधिं कर्तुं सपत्नीकान्‌ गुणान्वितान्‌ ॥ १८ ॥

उन दोनों ने भक्ति से पवित्र श्रीपुरुषोत्तम मास का व्रत किया। जब श्रीपुरुषोत्तम मास का व्रत करते उन दोनों का श्रीपुरुषोत्तम मास बीत गया ॥ १६ ॥

अन्तिम वाले दिन के आने पर स्त्री के साथ हर्ष से युक्त श्रद्धापूर्वक चित्रकुण्डल ने उद्यापन किया ॥ १७ ॥

पुरुषोत्तममास के उद्यापन विधि करने के लिये वेद और वेदांग को जानने वाले गुणी स्त्री सहित ब्राह्मणों को बुलाया ॥ १८ ॥

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