अध्याय २८

हे नारद! वहाँ पर धन के लोभ से कदर्य भी आया। उद्यापन विधि के पूर्ण होने पर चित्रकुण्डल ने ॥ १९ ॥

बहुत बड़े दानों से उन सपत्नी क ब्राह्मणों को प्रसन्न किया। उन समस्त ब्राह्मणों के प्रसन्न होने पर भूयसी दक्षिणा को दिया ॥ २० ॥

उस दी हुई भूयसी दक्षिणा से प्रसन्न अन्य सब ब्राह्मण गृह को गये परन्तु अत्यन्त लोभी कदर्य उस वैश्य चित्रकुण्डल के सामने रोता हुआ खड़ा हो गया ॥ २१ ॥

कदर्योऽप्यगमत्तत्र धनलोभेन नारद ॥ उद्यापनविधौ पूर्णे सञ्जा ते चित्रकुण्डलः ॥ १९ ॥

अत्युग्रदानैस्तान्‌ विप्रान्‌ सपत्नीकानतोषयत्‌ ॥ तुष्टेषु तेषु सर्वेषु भूयसीं दक्षिणामदात्‌ ॥ २० ॥

तद्दत्तभूयसी तुष्टा अन्ये विप्रा गृहान्‌ ययुः ॥ अतिलुब्धः कदर्यस्तु रुदंस्तस्थौ तदग्रतः ॥ २१ ॥

विनयावनतो भूत्वा सगद्गदमुवाच ह ॥ चित्रकुण्डल वैश्येश भगवद्भक्तिभासुर ॥ २२ ॥

पुरुषोत्तमव्रतं सम्यक्‌ भवता विधिना कृतम्‌ ॥ न तथा च कृतं केन कुत्रापि पृथिवीतले ॥ २३ ॥

भवानद्य कृतार्थोऽसि भाग्यवानसि सर्वथा ॥ तत्त्वया परया भक्त्या सेवितः पुरुषोत्तमः ॥ २४ ॥

और विनय से नम्र होकर गद्‌गद वाणी से बोला – हे चित्रकुण्डल! हे वैश्येश! हे भगवद्भक्ति के सूर्य! ॥ २२ ॥

आपने पुरुषोत्तम मास का व्रत विधि से अच्छी तरह किया। इस तरह पृथिवी तल में कहीं पर किसी ने नहीं किया ॥ २३ ॥

आप कृतार्थ हो, सर्वथा भाग्यवान्‌ हो जो तुमने परम भक्ति से पुरुषोत्तम भगवान्‌ का सेवन किया ॥ २४ ॥

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