अध्याय २८

तुम्हारे पिता धन्य हैं और तुम्हारी पतिव्रता माता धन्य हैं। जिन दोनों ने तुम्हारे समान हरिवल्ल भ पुत्र को पैदा किया ॥ २५ ॥

यह पुरुषोत्तम मास धन्य से भी धन्य है। जिसके सेवन से मनुष्य इस लोक के और परलोक के फल को प्राप्त करता है ॥ २६ ॥

हे विशांपते! तुम्हारी इस पूजा को देखकर मैं चकित हो गया। अहो! तुमने बहुत बड़ा काम किया इसमें सन्देह नहीं है ॥ २७ ॥

धन्यस्तव पिता धन्या माता च पतिदेवता ॥ याभ्यामुत्पादितः पुत्रस्त्वादृशो हरिवल्लोभः ॥ २५ ॥

धन्याद्धन्यतरश्चायं मासः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ यत्सेवनादवाप्नोति ह्यैहिकामुष्मिकं फलम्‌ ॥ २६ ॥

दृष्ट्वा हि तावकीं पूजां चकितोऽहं विशांपते ॥ अहो त्वया महत्कर्म कृतमेतन्न संशयः ॥ २७ ॥

अन्येभ्यो ब्राह्यणेभ्यश्च धनं दत्तं बृहन्मुदा ॥ न ददासि कथं मह्यं भाग्यहीनाय भूरिद ॥ २८ ॥

इति विज्ञापितस्तेन तस्मै धनमदादसौ ॥ तद्‌गृहीत्काऽकरोद्विप्रो धनं भूमिगतं मुदा ॥ २९ ॥

तत्रानेन महापूजा दृष्ट्वा श्रीपौरुषोत्तमी ॥ पुरुषोत्तममासश्च धनलोभेन संस्तुतः ॥ ३० ॥

हर्ष से दूसरे ब्राह्मणों को भी बहुत-सा धन दिया। हे भूरिद! भाग्यहीन मेरे लिए क्यों नहीं देते हो? ॥ २८ ॥

इस प्रकार कदर्य के कहने पर चित्रकुण्डल वैश्य ने कदर्य को धन दिया। कदर्य ने धन को लेकर प्रसन्नता से उसको जमीन में गाड़ दिया ॥ २९ ॥

वहाँ पर कदर्य ने श्रीपुरुषोत्तम की बड़ी पूजा देखी और धन के लोभ से पुरुषोत्तम मास की प्रशंसा की ॥ ३० ॥

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