अध्याय २८

पूजा के दर्शन माहात्म्य से और पुरुषोत्तम भगवान्‌ की स्तुति से तथा धन का लोभ होने पर भी मृगतीर्थ को आया ॥ ३१ ॥

सूतजी बोले – दर्शन से, स्तुति से, धन के लोभ करने से भी दुष्ट वानर को उत्तम तीर्थ का सेवन हुआ ॥ ३२ ॥

हे द्विजलोग! श्रद्धा से आदरपूर्वक पुरुषोत्तम देव के दर्शन और स्तुति में तत्पर सपत्नीक के पुण्य का क्या कहना है? ॥ ३३ ॥

पूजादर्शनमाहात्म्यात्‌ पुरुषोत्तमसंस्तवात्‌ ॥ धनलोभकृताद्वापि मृगतीर्थमुपागतः ॥ ३१ ॥

सूत उवाच ॥ दर्शनात्‌ स्तवनाद्वापि धनलोभकृतादपि ॥ दुष्टशाखामृगस्यापि जातं सत्तीर्थसेवनम्‌ ॥ ३२ ॥

कि पुनः श्रद्धया कर्तुर्दर्शनस्तवने द्विजाः ॥ पुरुषोत्तमदेवस्य सपत्नीकस्य सादरम्‌ ॥ ३३ ॥

नारद उवाच ॥ सुशीतलजले ब्रह्मन्‌ स्निग्धच्छाये मनोहरे ॥ सद्‌वृक्षमण्ढितेऽरण्ये तत्स्थितेः कारणं वद ॥ ३४ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्यामि तुभ्यं शुश्रुषवेऽनघ ॥ अत्रास्ति कारणं किञ्चिच्छ्रवणात्पापनाशनम्‌ ॥ ३५ ॥

यदा दाशरथी रामः सर्वार्थफलदायकः ॥ हतवान्‌ रावणं दुष्टं बद्‌ध्वा सेतुं महौदधौ ॥ ३६ ॥

नारद मुनि बोले – हे ब्रह्मन्‌! सुन्दर वृक्षों से शोभित, सुन्दर शीतल जल वाले, मनोहर घनी छायावाले वन में उसके रहने का कारण क्या है? सो आप कहिये ॥ ३४ ॥

श्रीनारायण बोले – हे नारद! हे अनघ! तुम सुनो, सुनने की इच्छा करनेवाले तुमको मैं कहूँगा। इसमें कुछ कारण है जिसके श्रवण से पापों का नाश हो जाता है ॥ ३५ ॥

जब समस्त अर्थ और फलों के दाता दशरथ के पुत्र रामचन्द्रजी ने समुद्र में सेतु बाँधकर दुष्ट रावण का नाश किया ॥ ३६ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13