अध्याय २८

उन रामचन्द्रजी ने विभीषण को छोड़कर बाकी समस्त राक्षसों का वध किया किसी को नहीं छोड़ा। बाद अग्नि में परीक्षा कर सीता को ग्रहण किया ॥ ३७ ॥

ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र आदि देवता रावण के वध से प्रसन्न होकर बोले कि हे राम! तुम वर को माँगो ॥ ३८ ॥

ऐसा कहने पर भक्तों को अभय करने वाले रामचन्द्र बोले – हे देवता लोग! यदि इस समय वरदान देना है तो सुनो ॥ ३९ ॥

विभीषणादृते तेन राक्षसा नावशेषिताः ॥ ततो वह्निविशुद्धा सा जानकी स्वीकृताऽधुना ॥ ३७ ॥

चतुर्मुखमहेशानपुरन्दरपुरःसरैः ॥ दशवक्त्रवधप्रीतैर्हे राम त्वं वरं वृणु ॥ ३८ ॥

इत्युक्तेऽवीवदद्रामो भक्तानामभयङ्करः ॥ सुराः श्रृणुत मद्वाक्यं यदि देयो वरोऽधुना ॥ ३९ ॥

अत्र ये वानराः शूरा रक्षोभिर्निहताश्च ते ॥ सञ्जीवयत तानाशु सुधावृष्टयाममाऽज्ञया ॥ ४० ॥

तथेत्युक्त्वा सुधावृष्टया वानरान्‌ समजीवयत्‌ ॥ चतुर्मुखमहेशानपुरन्दरपुरःसराः ॥ ४१ ॥

ततः सञ्जीतविताः सर्वे वानरा जयशालिनः ॥ अडुढौकन्‌ रामभद्रे चिरं सुप्तोत्थिता इव ॥ ४२ ॥

यहाँ पर राक्षसों से शूर वानर मारे गये हैं उनको हमारी आज्ञा से अमृत वृष्टि कर शीघ्र जिला दो ॥ ४० ॥

‘तथास्तु’ यह कह कर ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र आदि देवताओं ने अमृत की वृष्टि करके वानरों को जिला दिया ॥ ४१ ॥

तदनन्तर वे जयशाली समस्त वानर जीवित हो गये और चिर-काल तक शयन कर उठे हुए के समान देखने में आये। बाद रामचन्द्र ॥ ४२ ॥

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