अध्याय २८

चारों तरफ बैठे हुए समस्त वानरों के साथ पुष्पक विमान पर सवार होकर प्रसन्न मुखकमल वाले सपत्नीक रामचन्द्र बोले ॥ ४३ ॥

श्रीरामचन्द्रजी बोले – हे सुग्रीव! हे हनुमन्‌! हे तारात्मज! हे जाम्बवान्‌! वानरों के साथ आप लोगों ने मित्र का समस्त कार्य किया ॥ ४४ ॥

आप लोग उन वानरों को आज्ञा दो, जिसमें यहाँ से आप लोगों की आज्ञा पाकर वानर अपनी-अपनी इच्छानुसार जंगलों में जायँ ॥ ४५ ॥

अथ पुष्पकमारुह्य वानरान्‌ सर्वतः स्थितान्‌ ॥ अजीगदत्‌ सपत्नीकः प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥ ४३ ॥

श्रीराम उवाच ॥ हे सुग्रीवहनूमन्तौ हे तारात्मज जाम्बवन्‌ ॥ मित्रकार्यं कृतं सर्वं भवद्भिः सह वानरैः ॥ ४४ ॥

आज्ञापयन्तु तान्‌ सर्वान्‌ भवन्तो वानरानितः ॥ भवदाज्ञापिताः सर्वे यथेष्टं यान्तु ते यतः ॥ ४५ ॥

यत्र यत्र वने एते मामका दीर्घजीविनः ॥ वसन्ति वानरास्तत्र वृक्षाः पुष्पफलान्विताः ॥ ४६ ॥

नद्यो मृष्टलता वाथ शीतलं सुभगं सरः ॥ न केऽपि धर्षयिष्यन्ति सर्वे यान्तु ममाऽज्ञया ॥ ४७ ॥

अतो रामप्रभावेण यतो वानरजातयः ॥ तत्रनद्यो मृष्टजलाःसरश्च सुभगं वने ॥ ४८ ॥

हमारे ये दीर्घजीवी वानर जहाँ-जहाँ वास करें वहाँ के वृक्ष पुष्प फलों से युक्त हो जायँ ॥ ४६ ॥

नदी मीठे जलवाली हो, शीतल जल वाले सुन्दर तालाब हों, इनको कोई भी मना नहीं करे। हमारी आशा से समस्त वानर जायँ ॥ ४७ ॥

इसीलिए रामचन्द्र के प्रभाव से जहाँ वानर जाति के लोग वास करते हैं वहाँ वन में मीठे जलवाली नदी और सुंदर तालाब होते हैं ॥ ४८ ॥

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