अध्याय २८

पुष्प पत्र से युक्त, सुन्दर फलवाले बहुत से वृक्ष हैं परन्तु अदृष्ट से होनेवाले पूर्वजन्म के सुखदुःख ॥ ४९ ॥

जहाँ-जहाँ प्राणी निवास करता है वहाँ-वहाँ अवश्य जाते हैं क्योंकि बिना भोगे कर्म का नाश नहीं है। ऐसी वेद की आज्ञा है ॥ ५० ॥

श्रीनारायण बोले – फिर वहाँ पर यह लालची वानर पर्वत के समान बढ़ता हुआ भूख-प्यास से युक्त पीड़ित वन में विचरण लरने लगा ॥ ५१ ॥

लसत्फला महावृक्षाः पुष्पपल्लवसंयुताः ॥ परन्तु सुखदुःखानि प्राक्तनादृष्टजानि च ॥ ४९ ॥

यत्र यत्र वसेज्जन्तुस्तत्र तत्रोपयान्ति हि ॥ नाभुक्तंा क्षीयते कर्म इति वेदानुशासनम्‌ ॥ ५० ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ अथासौ वानरस्तत्र ववृघे पर्वतोपमः ॥ बृहत्‌क्षुत्तृट्‌समायुक्तो लोलुपो व्यचरद्वने ॥ ५१ ॥

जन्मतस्तस्य वक्त्रेऽभूत्‌ पीडा पित्तसमुद्भवा ॥ ययाऽसृक्‌ च्यवते वक्त्रव्रणतश्चो दिवानिशम्‌ ॥ ५२ ॥

अत्यन्तवेदनाविष्टो नात्तुं शक्तस्तु किञ्चन ॥ स च नानरचापल्याद्‌ द्रुमेभ्यः सत्फलानि च ॥ ५३ ॥

लुनीय वदनाभ्याशे नीत्वा तत्याज भूरिशः ॥ नैकत्र पीडया स्थातुं शक्तोऽसौ वानरः क्कचित्‌ ॥ ५४ ॥

उसके मुख में पित्त के प्रकोप से पीड़ा उत्पन्न हुई जो उसका जन्म का रोग था। जिस पीड़ा से मुख के घावों से दिन-रात रुघिर बहा करता है ॥ ५२ ॥

अत्यन्त पीड़ा के कारण कुछ भी भोजन नहीं कर सकता था और वह वानर चंचलतावश वृक्षों में से उत्तम फलों को तोड़ कर ॥ ५३ ॥

मुख के पास ले जाकर बहुत से फलों को जमीन में गिरा दिया करता था। वहाँ वानर पीड़ा के कारण कहीं भी एक स्थान पर बैठने में असमर्थ था ॥ ५४ ॥

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