अध्याय २९

पुण्यशील-सुशील बोले – हे विभो! गोलोक को चलो, यहाँ देरी क्यों करते हो? तुमको पुरुषोत्तम भगवान्‌ का सामीप्य मिला है ॥ १ ॥

कदर्य बोला – मेरे बहुत कर्म अनेक प्रकार से भोगने योग्य हैं। परन्तु हमारा उद्धार कैसे हुआ जिससे गोलोक को प्राप्त हुआ? ॥ २ ॥

जितनी वर्षा की धारायें हैं, जितने तृण हैं, पृथिवी पर धूलि के कण हैं, आकाश में जितनी तारायें हैं उतने मेरे पाप हैं ॥ ३ ॥

पुण्यशीलसुशीलावूचतुः ॥ विभो प्रयाहि गोलोकं कथमत्र विलम्बसे ॥ पुरुषोत्तमसान्निध्यं त्वया लब्धं विशेषतः ॥ १ ॥

कदर्य उवाच ॥ बहूनि मम कर्माणि सन्ति भोग्यान्यनेकशः ॥ केन मे निष्कृतिर्जाता यतो गोलोकमाप्नुयाम्‌ ॥ २ ॥

यावन्त्या वर्षधाराश्च तृणानि भूरजःकणाः ॥ यावन्त्यस्तारकां व्योम्नि तावत्पापानि सन्ति में ॥ ३ ॥

कथमेतन्मया प्राप्तं् वपुर्दिव्यं मनोहरम्‌ ॥ एतत्कारणमत्युग्रं मह्यं ब्रूत हरेः प्रियौ ॥ ४ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इति वाचमुपाकर्ण्य हरेर्दूतावथोचतुः ॥ हरिदूतावूचतुः ॥ अहो देव कथं नैव विज्ञातं साधनं महत्‌ ॥ ५ ॥

प्रभो न जायते कस्मान्मासः सर्वोत्तमोत्तमः ॥ विष्णुप्रियो महापुण्यो नाम्ना वै पुरुषोत्तमः ॥ ६ ॥

मैंने यह सुन्दर तथा मनोहर शरीर कैसे प्राप्त किया? हे हरि भगवान्‌ के प्रिय! इसका अति उग्र कारण मुझसे कहिये ॥ ४ ॥

श्रीनारायण बोले – कदर्य के इस प्रकार वाणी को श्रवणकर हरि के दूतों ने कहा। हरिदूत बोले – अहो! आश्चर्य है। हे देव! आपने इस पद की प्राप्ति का कारण महान्‌ साधन कैसे नहीं जाना ॥ ५ ॥

हे प्रभो! सबमें उत्तमोत्तम, विष्णु का प्रिय, महान्‌ पुण्यफल को देनेवाला, पुरुषोत्तममास नाम से प्रसिद्ध मास को क्यों नहीं जाना? ॥ ६ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16