अध्याय २९

घृत दूध को छोड़कर अन्य वस्तु सशेष भोजन करे। भोजन के बाद उस शेष को अंगुलियों के अग्र भाग में रख कर ॥ ५५ ॥

अञ्जरलि जल से पूर्ण करे। उसका आधा जल पी जाय और अंगुलियों के अग्र भाग में स्थित शेष को पृथिवी में देकर ऊपर से अञ्जूलि का शेष आधा जल ॥ ५६ ॥

विद्वान्‌ उसी जगह इस मन्त्र को पढ़ता हुआ सिंचन करे। ऐसा न करने से ब्राह्मण पाप का भागी होता है, फिर प्रायश्चि त्त करने से शुद्ध होता है ॥ ५७ ॥

सर्वं सशेषमश्नी यात्‌ घृतपायसवर्जितम्‌ ॥ अग्राङ्गुलिषु तच्छेषं निधाय भोजनोत्तरम्‌ ॥ ५५ ॥

जलपूर्णाञ्जलिं कृत्वा पीत्वा चैव तदर्धकम्‌ ॥ अग्राङ्गुलिस्थितं शेषं भूमौ दत्त्वाऽञ्जजलेर्जलम्‌ ॥ ५६ ॥

शेषं निषिञ्चे्त्तत्रैव पठन्‌ मन्त्रमिमं बुधः ॥ अन्यथा पापभाग्विप्रः प्रायश्चित्तेन शुद्धयति ॥ ५७ ॥

रौरवे पूयनिलये पद्मार्बुदनिवासिनाम्‌ ॥ आर्थिनामुदकं दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु ॥ ५८ ॥

निषिच्यानेन मन्त्रेण कुर्याद्दन्तविशोधनम्‌ ॥ आचम्य पात्रमुत्सार्य किञ्चिदार्द्रेण पाणिना ॥ ५९ ॥

ततः परं समुत्थाय बहिः स्थित्वा समाहितः ॥ शोधयेन्मुखहस्तौ च मृदा शुद्धजलेन च ॥ ६० ॥

मन्त्रार्थ – रौरव नरक में, पीप के गढ़े में पद्म अर्बुद वर्ष तक वास करने वाले तथा इच्छा करने वाले के लिये मेरा दिया हुआ यह जल अक्षय्य होता हुआ प्राप्त हो ॥ ५८ ॥

मन्त्र पढ़ के जल से सिंचन कर दाँतों को शुद्ध करे। आचमन कर गीले हाथ से पात्र को कुछ हटा कर ॥ ५९ ॥

उस भोजन स्थान से उठकर, बाहर बैठकर, स्वस्थ होकर, मिट्टी और जल से मुख-हाथ को शुद्ध कर ॥ ६० ॥

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