अध्याय २९

सोलह कुल्लाा कर, शुद्ध हो सुख से बैठकर इन दो मन्त्रों को पढ़ता हुआ हाथ से उदर को स्पर्श करे ॥ ६१ ॥

अगस्त्य, कुम्भकर्ण, शनि, बड़वानल और पंचम भीम को आहार के परिपाक के लिये स्मरण करे ॥ ६२ ॥

जिसने आतापी को मारा और वातापी को भी मार डाला, समुद्र का शोषण किया वह अगस्त्य मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ ६३ ॥

कृत्वा षोडशगण्डूषान्‌ शुद्धो भूत्वा सुखासनः ॥ इमौ मन्त्रौ पठन्नेशव पाणिनोदरमालभेत्‌ ॥ ६१ ॥

अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च वडवानलम्‌ ॥ आहारपरिपाकार्थं स्मरेद्भीमं च पञ्चमम्‌ ॥ ६२ ॥

आतापी मारितो येन वातापो च निपातितः ॥ समुद्रः शोषितो येन स मेऽगस्त्यः प्रसीदतु ॥ ६३ ॥

ततः श्रीकृष्णदेवस्य कुर्वीत स्मरणं मुदा ॥ भूयोऽप्याचम्य कर्तव्यं ततस्ताम्बूलभक्षणम्‌ ॥ ६४ ॥

भुक्त्वोपविष्टः श्रीकृष्णं परं ब्रह्म विचारयेत्‌ ॥ सच्छास्त्रादिविनोदेन सन्मार्गाद्यविरोधिना ॥ ६५ ॥

ततश्चाध्यात्मविद्यायाः कुर्वीत श्रवणं सुधीः ॥ सर्वथा वृत्तिहीनोऽपि मुहूर्त स्वस्थमानसः ॥ ६६ ॥

बाद प्रसन्न मन से श्रीकृष्ण देव का स्मरण करे।  फिर आचमन कर ताम्बूल भक्षण करे ॥ ६४ ॥

भोजन करके बैठ कर परब्रह्म श्रीकृष्ण का उत्तम मार्ग के अविरोधी उत्तम शास्त्रों के विनोद से विचार करे ॥ ६५ ॥

बाद बुद्धिमान्‌ अध्यात्मविद्या का श्रवण करे। सर्वथा आजीविका से हीन मनुष्य भी एक मुहूर्त स्वस्थ मन होकर श्रवण करे ॥ ६६ ॥

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