अध्याय २९

श्रवण कर धर्म को जानता है, श्रवण कर पाप का त्याग करता है, श्रवण के बाद मोह की निवृत्ति होती है, श्रवण कर ज्ञानरूपी अमृत को प्राप्त करता है ॥ ६७ ॥

नीच भी श्रवण करने से श्रेष्ठ हो जाता है और श्रेष्ठ भी श्रवण से रहित होने से नीच हो जाता है ॥ ६८ ॥

फिर बाहर जाकर यथासुख व्यवहार आदि करे और सर्वथा सिद्धि को देनेवाले श्रीकृष्ण भगवान्‌ का मन से ध्यान करे ॥ ६९ ॥

श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा पापं परित्यजेत्‌ ॥ श्रुत्वा निवर्तते मोहः श्रुत्वा ज्ञानामृतं लभेत्‌ ॥ ६७ ॥

नीचोऽपि श्रवणेनाशु श्रेष्ठत्वं प्रतिपद्यते ॥ श्रेष्ठोऽपि नीचतां याति रहितः श्रवणेन च ॥ ६८ ॥

व्यवहारं ततः कुर्याद्‌बहिर्गत्वा यथासुखम्‌ ॥ श्रीकृष्णं मनसा ध्यायेत्‌ सर्वसिद्धिप्रदायकम्‌ ॥ ६९ ॥

सूर्येऽस्तशिखरं प्राप्ते‌ तीर्थं गत्वाऽथवा गृहम्‌ ॥ सायंसन्ध्यामुपासीत धौताङ्घ्रिः सपवित्रकः ॥ ७० ॥

यः प्रमादान्नर कुर्वीत सायं सन्ध्यां द्विजाधमः ॥ स गोवधमवाप्नोति मृते रौरवमाप्नुयात ॥ ७१ ॥

कदाचित्‌ काललोपेऽपि सङ्कटे वा पथि स्थितः ॥ आनिशीथात्‌ प्रकुर्वीत सायंसन्ध्यां द्विजोत्तमः ॥ ७२ ॥

सूर्यनारायण के अस्ताचल जाने के समय तीर्थ में जाकर अथवा गृह में ही पैर धोकर, पवित्र वस्त्र धारण कर, सायंसन्ध्या की उपासना करे ॥ ७० ॥

जो द्विजों में अधम, प्रमाद से सायंसन्ध्या नहीं करता है वह गोवध पाप का भागी होता है और मरने पर रौरव नरक को जाता है ॥ ७१ ॥

कभी समय से न करने पर, संकट में, मार्ग में हो तो द्विजश्रेष्ठ आधी रात के पहले सायंसंध्या को करे ॥ ७२ ॥

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