अध्याय २९

जो ब्राह्मण श्रद्धा के साथ प्रातः, मध्याह्न और सायंसन्ध्या की उपासना करता है उसका तेज घृत छोड़ने से अग्नि के समान अत्यन्त बढ़ता है ॥ ७३ ॥

सायंकाल में सूर्यनारायण के आधा अस्त होने पर प्राणायाम कर ‘आपो हिष्ठा’ – इस मंत्र से मार्जन करे ॥ ७४ ॥

और सायंकाल ‘अग्निश्च मा॰ -‘ इस मन्त्र से आचमन करे और प्रातःकाल ‘सूर्यश्च मा॰ -‘ इस मन्त्र से आचमन करे। पश्चिम मुख बैठ कर मौन तथा समाहित मन होकर ॥ ७५ ॥

यस्त्रिसन्ध्यमुपासीत ब्राह्मणः श्रद्धयाऽन्वितः ॥ तत्तेजो वर्धतेऽत्यन्तं घृतेनेव हुताशनः ॥ ७३ ॥

सादित्यां पश्चिमां सन्ध्यामर्धास्तमितभास्कराम्‌ ॥ प्राणानायम्य सम्प्रोक्ष्य मन्त्रेणाब्‌दैवतेन तु ॥ ७४ ॥

सायमग्निश्चश मेत्युक्त्वा प्रातः सूर्येत्यपः पिवेत्‌ ॥ प्रत्यङ्मुखोपविष्टस्तु वाग्यतः सुसमाहितः ॥ ७५ ॥

प्रणवव्याहृतियुतां गायत्रीं तु जपेत्ततः ॥ अक्षसूत्रं समादाय सम्यगातारकोदयात्‌ ॥ ७६ ॥

वारुणीभिस्तदादित्यमुपस्थाय प्रदक्षिणम्‌ ॥ कुर्वन्‌ दिशो नमस्कुर्याद्दिगीशांश्चग पृथक्‌-पथक्‌ ॥ ७७ ॥

उपास्य पश्चिामां सन्ध्यां हुत्वाऽग्निमश्नींयात्ततः ॥ भृत्यैः परिवृतो भूत्वा नातितृप्तोऽथ संविशेत्‌ ॥ ७८ ॥

प्रणय और व्याहृति सहित गायत्री मन्त्र का रुद्राक्ष की माला लेकर तारा के उदय होने तक जप करे ॥ ७६ ॥

वरुण सम्बन्धी ऋचाओं से सूर्यनारायण का उपस्थान कर, प्रदक्षिणा करता हुआ दिशाओं को तथा पृथक्‌-पृथक्‌ दिशाओं के स्वामी को नमस्कार करे ॥ ७७ ॥

सायं सन्ध्या की उपासना कर अग्नि में आहुति देकर भृत्यवर्गों के साथ अल्प भोजन करे। बाद कुछ समय तक बैठ जाय ॥ ७८ ॥

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