अध्याय २९

सायंकाल और प्रातःकाल भोजन की इच्छा नहीं होने पर भी वैश्वदेव और बलि कर्म सदा करना चाहिये। यदि नहीं करता है तो पातकी होता है ॥ ७९ ॥

शाम को भोजन कर बैठने के बाद गृहस्थाश्रमी हाथ-पैर धोकर तकिया सहित कोमल शय्या पर जाय ॥ ८० ॥

अपने गृह में पूर्व की ओर शिर करके शयन करे, श्वरसुर के गृह में दक्षिण की ओर शिर करके शयन करे, परदेश में पश्चिम की ओर शिर करके शयन करे, परन्तु उत्तर की ओर शिर करके कभी शयन नहीं करे ॥ ८१ ॥

सायं प्रातर्वैश्वकदेवः कर्तव्यो बलिकर्म च ॥ अनश्नओतापि सततमन्यथा किल्बिषी भवेत्‌ ॥ ७९ ॥

कृतपादादिशौचस्तु भुक्त्वा सायं ततो गृही ॥ गच्छेच्छय्यां ततो मृद्वीमुपधानसमन्विताम्‌ ॥ ८० ॥

स्वगृहे प्राक्‌छिराः शेते श्वासुरे दक्षिणाशिराः ॥ प्रवासे पश्चिसमशिरा न कदाचिदुदक्‌छिरः ॥ ८१ ॥

रात्रिसूक्तं जपेत्‌ स्मृत्वा देवांश्च सुखशायिनः ॥ नमस्कृत्याव्ययं विष्णुं समाधिस्थः स्वपेन्निशि ॥ ८२ ॥

अगस्त्यो माधवश्चै्व मुचुकुन्दो महाबलः ॥ कपिलो मुनिरास्तीकः पञ्चैतते सुखशायिनः ॥ ८३ ॥

माङ्गल्यं पूर्णकुम्भं च शिरःस्थाने निधाय च ॥ वैदिकैर्गारुडैर्मन्त्रै रक्षां कृत्वा स्वपेत्ततः ॥ ८४ ॥

रात्रिसूक्त का जप करे और सुखशायी देवताओं का स्मरण कर अविनाशी विष्णु भगवान्‌ को नमस्कार कर, स्वस्थचित्त हो, रात्रि में शयन करे ॥ ८२ ॥

अगस्त्य, माधव, महाबली मुचुकुन्द, कपिल, आस्तीक मुनि ये पाँच सुखशायी कहे गये हैं ॥ ८३ ॥

मांगलिक जल से पूर्ण घट को शिर के पास रखकर वैदिक और गारुड़ मन्त्रों से रक्षा करके शयन करे ॥ ८४ ॥

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