अध्याय २९

ऋतुकाल में स्त्री के पास जाय और सदा अपनी स्त्री से प्रेम करे, ब्रती रति की कामना से पर्व को छोड़ कर अपनी स्त्री के पास जाय ॥ ८५ ॥

प्रदोष और प्रदोष के पिछले प्रहर में वेदाभ्यास करके समय व्यतीत करे। फिर दो पहर शयन करनेवाला ब्रह्मतुल्य होने के योग्य होता है ॥ ८६ ॥

यह सब प्रतिदिन के समस्त कृत्यसमुदाय को कहा। गृहस्थाश्रमी भलीभाँति इसको करे और यही गृहस्थाश्रम का लक्षण है ॥ ८७ ॥

ऋतुकालाभिगामी स्यात्‌ स्वदारनिरतः सदा ॥ पर्ववर्जं व्रजेदेनां तद्‌व्रती रतिकाम्यया ॥ ८५ ॥

प्रदोषपश्चिमौ यामौ वेदाभ्यासेन यौ नयेत्‌ ॥ यामद्वयं शयानस्तु ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ८६ ॥

एतत्सर्वमशेषेण कृत्यजातं दिने दिने ॥ कर्तव्यं गृहिभिः सम्यग्गृहस्थाश्रमलक्षणम्‌ ॥ ८७ ॥

अहिसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम्‌ ॥ शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उच्यते ॥ ८८ ॥

परदारेष्वसंसर्गो धर्मस्त्रीपरिरक्षणम्‌ ॥ अदत्तादानविरमो मधुमांसविवर्जनम्‌ ॥ ८९ ॥

अहिंसा, सत्य वचन, समस्त प्राणी पर दया, शान्ति यथाशक्ति दान करना, गृहस्थाश्रम का धर्म कहा है ॥ ८८ ॥

पर स्त्री से भोग नहीं करना, अपनी धर्मपत्नीर की रक्षा करना, बिना दी हुई वस्तु को नहीं लेना, शहद, मांस को नहीं खाना ॥ ८९ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16