अध्याय २९

यह पाँच प्रकार का धर्म बहुत शाखा वाला, सुख देनेवाला है। शरीर से होने वाले धर्म को उत्तम प्राणियों को करना चाहिये ॥ ९० ॥

एष पञ्चविधो धर्मो बहुशाखः सुखोदयः ॥ देहिभिर्देहपरमैः कर्तव्यो देहसम्भवः ॥ ९० ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ अशेषवेदोदितसच्चरित्र मेतद्‌‌गृहस्थाश्रमलक्षणं हि ॥ उक्तं समासेन च लक्षणेन तुभ्यं मुने लोकहिताय सम्यक्‌ ॥ ९१ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे अह्निककथनं नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥

श्रीनारायण बोले – सम्पूर्ण वेदों में कहा हुआ यह उत्तम चरित्र गृहस्थाश्रम का लक्षण है। हे मुने! इसको लोक के हित के लिये संक्षेप में लक्षण के साथ आपसे मैंने अच्छी तरह कहा ॥ ९१ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे आह्निक कथनं नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥

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