अध्याय २९

उस पुरुषोत्तम मास में देवताओं से भी न होनेवाला तप तुमने किया। हे महाराज! वन में वानर शरीर से अज्ञान में वह तप भया ॥ ७ ॥

मुखरोग के कारण अज्ञान से अनाहार व्रत भया और तुमने बन्दरपने की चंचलतावश वृक्ष से फलों को तोड़कर ॥ ८ ॥

पृथिवी पर फेंका उन फलों से दूसरे मनुष्य तृप्त हुए। अन्तःकरण में विशेष दुःख होने से पानी भी नहीं पान किया ॥ ९ ॥

तस्मिंस्त्वया तपश्चीर्णमशक्यं यत्सुरैरपि ॥ अविज्ञातं महाराज कपिदेहेन कानने ॥ ७ ॥

मुखरोगादनाहारव्रतं जातमजानतः ॥ त्वया च कपिचाञ्चल्यात्‌ फलान्युत्कृत्य वृन्ततः ॥ ८ ॥

क्षिप्तानि पृथिवीपीठे तृप्तास्तैरितरे जनाः ॥ पानीयमपि नो पीतमन्तर्दुःखेन भूरिशः ॥ ९ ॥

सञ्जातं ते तपस्तीव्रमज्ञानात्‌ पुरुषोत्तमे ॥ परोपकारः सञ्जातःफलपातेन तेऽनघ ॥ १० ॥

शीतवातातपा रौद्राः सोढा विचरता वने ॥ महातीर्थे वरे रम्ये पञ्चाहं प्लवनं कृतम्‌ ॥ ११ ॥

तस्मात्ते स्नानजं पुण्यं मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ एवं रुग्णस्य ते जातमज्ञानात्तप उत्तमम्‌ ॥ १२ ॥

इस तरह श्रीपुरुषोत्तम मास में अज्ञानवश तुम से तीव्र तप हो गया। हे अनघ! फलों के फेंकने से परोपकार भी हो गया ॥ १० ॥

वन में घूमते-घूमते शीत, वायु, घाम को सहन किया और श्रेष्ठ तीर्थ में सुन्दर महातीर्थ में पाँच दिन गोता लगाया ॥ ११ ॥

जिससे श्रीपुरुषोत्तम मास में तुमको स्नान का पुण्य प्राप्त हो गया। इस प्रकार तुम्हारे रोगी के अज्ञान से उत्तम तप हो गया ॥ १२ ॥

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