अध्याय २९

सो यह सब सफल भया और तुमने इस समय अनुभव किया। जब बिना समझे पुरुषोत्तम मास के सेवन हो जाने से तुमको यह फल मिला ॥ १३ ॥

तो मनुष्य इस पुरुषोत्तम मास के उत्तम माहात्म्य को जानकर श्रद्धा से विधिपूर्वक कर्म करे तो उसका क्या कहना है ॥ १४ ॥

तुमने अपना जो अर्थ साधन किया वैसा करने को कौन समर्थ है? पुरुषोत्तम भगवान्‌ को और कोई वस्तु प्रीति को देनेवाली नहीं है ॥ १५ ॥

तदेतत्सफलं जातमनुभूतं त्वयाऽधुना ॥ व्याजतोऽपि कृतेनैव सफलं स्याद्यथा तव ॥ १३ ॥

किं पुनः श्रद्धयैतस्मिन्‌ मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ विधिना कुर्वतः कर्म ज्ञात्वा माहात्म्यमुत्तमम्‌ ॥ १४ ॥

यस्त्वया साधितः स्वार्थस्तादृक्कर्तुं च कः क्षमः ॥ यस्मिन्नेकोपवासेन मुच्यते पापराशिभिः ॥ १५ ॥

नैतत्तुल्यं भवेत्किञ्चित्पुरुषोत्तमप्रीतिदम्‌ ॥ ते धन्याः कृतकृत्यास्ते तद्‌व्रतं ये प्रकुर्वते ॥ १६ ॥

दुर्लभं मानुषं जन्म भूखण्डे भारताजिरे ॥ तादृशं जनुरासाद्य सेवन्ते पुरुषोत्तमम्‌ ॥ १७ ॥

ते सदा सुभगाः पुण्यास्तेषां च सफलो भवः ॥ येषां सर्वोत्तमो मासः स्‍नानदानजपैर्गतः ॥ १८ ॥

इस भरतखण्ड में अति दुर्लभ मनुष्य योनि में जन्म लेकर जो पुरुषोत्तम भगवान्‌ की सेवा करते हैं। जिस पुरुषोत्तम मास में एक भी उपवास के करने से मनुष्य पापपुञ्ज  से छूट जाता है वहाँ तुमने महीनों उपवास किया इस उग्र तपस्या का फल कहाँ जायगा? ॥ १६ ॥

इस मास के समान वे प्राणी धन्य और कृतकृत्य हैं ॥ १७ ॥

वे सदा भाग्यवान्‌ पुण्यकर्म के करनेवाले पवित्र हैं और उनका जन्म सफल है जिनका सबमें उत्तम पुरुषोत्तम मास स्नान, दान, जप से व्यतीत हुआ है ॥ १८ ॥

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