अध्याय २९

श्रीपुरुषोत्तम मास में दान, पितृकार्य, अनेक प्रकार के तप ये सब अन्य मास की अपेक्षा कोटि गुण अधिक फल देने वाले हैं ॥ १९ ॥

जो पुरुषोत्तम मास के आने पर स्नान-दान से रहित रहता है उस नास्तिक, पापी, शठ, धर्मध्वज, खल को धिक्का र है ॥ २० ॥

श्रीनारायण बोले – पुण्यशील और सुशील से वर्णित अपने अदृष्ट को सुनकर, चकित होता हुआ कदर्य प्रसन्न हो रिमांचित हो गया ॥ २१ ॥

दानानि पितृकार्याणि तपांसि विविधानि च ॥ तानि कोटिगुणान्येव सम्प्राप्ते  पुरुषोत्तमे ॥ १९ ॥

धिक्‌ तं च नास्तिकं पापं शठं धर्मध्वजं खलम्‌ ॥ पुरुषोत्तममासाद्य स्नानदानविवजितः ॥ २० ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ पुण्यशीलसुशीलाभ्यामदृष्टं वर्णितं निजम्‌ ॥ तच्छ्रुत्वा चकितो हृष्टः पुलकाङ्कितविग्रहः ॥ २१ ॥

तीर्थदेवान्‌ नमस्कृत्य कालञ्जयरगिरिं ततः ॥ ननाम काननाधीशान्‌ सर्वगुल्मलतातरून्‌ ॥ २२ ॥

ततः प्रदक्षिणीकृत्य विमानं विनयान्वितः ॥ आरुरोह घनश्यामो लसत्पीताम्बरावृतः ॥ २३ ॥

पश्यत्सु सर्व देवेषु गन्धर्वाद्यैरभिष्टु तः ॥ वाद्ययानेषुं वाद्येषु किन्नराद्यैर्मुहुर्मुहुः ॥ २४ ॥

तीर्थ के देवताओं को नमस्कार कर बाद कालञ्जआर पर्वत को नमस्कार किया। और वन के देवताओं को तथा गुल्म, लता वृक्ष को नमस्कार किया ॥ २२ ॥

बाद विनय से युक्त हो विमान की प्रदक्षिणा कर मेघ के समान श्यामर्ण, सुन्दर पीताम्बर को धारण कर वह कदर्य विमान पर सवार हो गया ॥ २३ ॥

सम्पूर्ण देवताओं के देखते हुए गन्धर्व आदि से स्तुत और किन्नर आदिकों से बार-बार बाजा बजाये जाने पर ॥ २४ ॥

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