अध्याय २९

इन्द्रादि देवताओं ने प्रसन्न होकर मन्द पुष्पवृष्टि को करते हुए उसका आदरपूर्वक पूजन किया ॥ २५ ॥

फिर आनन्द से युक्त, योगियों को दुर्लभ, गोप-गोपी-गौओं से सेवित, रासमण्डल से शोभित गोलोक को गया ॥ २६ ॥

जरामृत्यु रहित जिस गोलोक में जाकर प्राणी शोक का भागी नहीं होता है, उस गोलोक में यह चित्रशर्म्मा पुरुषोत्तम मास के सेवन से गया ॥ २७ ॥

पुष्पवृष्टिमुचो देवा मन्दं मन्दं मुदान्विताः ॥ सादरं पूजयाञ्चक्रुः पुरन्दरपुरःसराः ॥ २५ ॥

ततो जगाम गोलोकं सानन्दं योगिदुर्लभम्‌ ॥ गोपगोपीगवां सेव्यं रासमण्डलमण्डितम्‌ ॥ २६ ॥

यत्र गत्वा न शोचन्ति जरामृत्युविवर्जिते ॥ तत्रासौ चित्रशर्मा च पुरुषोत्तमसेवनात्‌ ॥ २७ ॥

व्याजेनापि भुमोदोच्चैजर्विहाय वानरं वपुः ॥ द्विभुजं मुरलीहस्तं दृष्ट्वा श्रीपुरुषोत्तमम्‌ ॥ २८ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इदमाश्चर्यमालोक्य देवाः सर्वे सुविस्मिताः ॥ स्वं स्वं स्थानं ययुः सर्वे शंसन्तः पुरुषोत्तमम्‌ ॥ २९ ॥

नारद उवाच ॥ दिवसस्यादिमे भागे त्वयाऽह्निकमुदीरितम्‌ ॥ तद्दिवापरभागीयं कथं कार्यं तपोधन ॥ ३० ॥

व्याज से पुरुषोत्तम मास के सेवन से वानर शरीर छोड़कर दो भुजाधारी मुरली हाथ में लिये पुरुषोत्तम भगवान्‌‍ को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ ॥ २८ ॥

श्रीनारायण बोले – इस आश्चर्य को देखकर समस्त देवता चकित हो गये और श्रीपुरुषोत्तम की प्रशंसा करते अपने-अपने स्थान को गये ॥ २९ ॥

नारद मुनि बोले – हे तपोधन! आपने दिन के प्रथम भाग का कृत्य कहा। पुरुषोत्तम मास के दिन के पिछले भाग में होने वाले कृत्य को कैसे करना चाहिये ॥ ३० ॥

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