अध्याय २९

हे बोलनेवालों में श्रेष्ठ! गृहस्थ के उपकार के लिये मुझसे कहिये। क्योंकि आपके समान महात्मा सदा सबके उपकार के लिये विचरण करते रहते हैं ॥ ३१ ॥

श्रीनारायण बोले – प्रातःकाल के कृत्य को विधिपूर्वक समाप्त कर, बाद मध्याह्न में होनेवाली सन्ध्या को करके, तर्पण को करे ॥ ३२ ॥

देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, सिद्ध, यक्ष, सर्ष, दैत्य, प्रेत, पिशाच, नाग ये सब जो अन्न की इच्छा करते हैं वे सब मेरे से दिये गये अन्न को ग्रहण करें ॥ ३३ ॥

गृहस्थस्योपकाराय वद मे वदतां वर ॥ सदा सर्वोपकाराय चरन्ति हि भवादृशाः ॥ ३१ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ प्रातःकालोदितं कर्म समाप्य विधिवत्ततः ॥ कृत्वा माध्याह्निकीं सन्ध्यां तिलतर्पणमाचरेत्‌ ॥ ३२ ॥

देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाश्च यक्षोरगदैत्यसंघाः ॥ प्रेताः पिशाचा उरगाः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मयाऽत्र दत्तम्‌ ॥ ३३ ॥

ततः पञ्चमहायज्ञान्‌ कुर्याद्भूतबलिं ततः ॥ काकस्य च शुनश्चैव बलिं दत्त्वैवमुच्चरन्‌ ॥ ३४ ॥

इत्युक्त्वा सर्वभूतेभ्यो बलिं दद्यात्‌ पुनः पृथक्‌ ॥ तत आचम्य विधिवच्छ्रद्धया प्रीतमानसः ॥ ३५ ॥

द्वारावलोकनं कुर्यादतिथिग्रहणाय च ॥ गोदोहकालं भाग्यात्तु प्राप्तश्चे दतिथिर्यदि ॥ ३६ ॥

फिर पंचमहायज्ञ को करे, उसके बाद भूतबलि को करे और काक, कुत्ता को श्लो क पढ़ता हुआ बलि देवे ॥ ३४ ॥

इस प्रकार कहकर समस्त भूतों को पृथक्‌-पृथक्‌ बलि देवे, फिर विधिपूर्वक आचमन कर प्रसन्न होकर श्रद्धा से ॥ ३५ ॥

अतिथि प्राप्ति के लिये गो दुहने के समय तक द्वार का अबलोकन करे। यदि भाग्य से अतिथि मिल जाय तो ॥ ३६ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16