अध्याय २९

बुद्धिमान्‌ प्रथम वाणी से सत्कार करके उस अतिथि का देवता के समान पूजन करे और यथाशक्ति अन्न-जल से सन्तुष्ट करे ॥ ३७ ॥

फिर विधिपूर्वक सब व्यञ्जपन से युक्त सिद्ध अन्न से निकाल कर भिक्षु और ब्रह्मचारी को भिक्षा देवे ॥ ३८ ॥

संन्यासी और ब्रह्मचारी ये दोनों सिद्ध अन्न के मालिक हैं। इनको अन्न न देकर भोजन करनेवाला चन्द्रायण व्रत करे ॥ ३९ ॥

आदौ सत्कृत्य वचसा देववत्‌ पूजयेत्‌ सुधीः ॥ तोषयेत्‌ परया भक्त्या यथाशक्त्यन्न-पानतः ॥ ३७ ॥

भिक्षां च भिक्षवे दद्याद्विधिवद्‌ब्रह्मचारिणे ॥ आकल्पितान्नादुद्‌घृत्य सर्वव्यञ्जनसंयुतात्‌ ॥ ३८ ॥

यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्कान्नस्वामिनावुभौ ॥ तयोरन्नमदत्वैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्‌ ॥ ३९ ॥

यतिहस्ते जलं दद्याद्भैक्षं दद्यात्‌ पुनर्जलम्‌ ॥ तद्भैक्षं मेरुणा तुल्यं तज्जलं सागरोपमम्‌ ॥ ४० ॥

सत्कृत्य भिक्षवे भिक्षां यः प्रयच्छति मानवः ॥ गोप्रदानसमं पुण्यमित्याह भगवान्‌ यमः ॥ ४१ ॥

ततश्च भोजनं कुर्यात्‌ प्राङ्मुखो मौनमास्थितः ॥ प्रशस्ते शुद्धपात्रे च भुञ्जीतान्नमकुत्सयन्‌ ॥ ४२ ॥

प्रथम संन्यासी के हाथ पर जल देकर भिक्षान्न देवे तो वह भिक्षान्न मेरु पर्वत के समान और जल समुद्र के समान कहा गया है ॥ ४० ॥

संन्यासी को जो मनुष्य सत्कार करके भिक्षा देता है उसको गोदान के समान पुण्य होता है इस बात को यमराज भगवान्‌ ने कहा है ॥ ४१ ॥

फिर मौन होकर पूर्वमुख बैठकर शुद्ध और बड़े पात्र में अन्न को रखकर प्रशंसा करता हुआ भोजन करे ॥ ४२ ॥

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