अध्याय २९

अपने आसन पर अपने बर्तन में एक वस्त्र से भोजन नहीं करे। स्वयम्‌ आसन पर बैठ कर स्वस्थचित्त, प्रसन्न मन होकर ॥ ४३ ॥

जो मनुष्य अकेला ही अपने काँसे के पात्र में भोजन करता है तो उसके आयु, प्रज्ञा, यश और बल ये चार बढ़ते हैं ॥ ४४ ॥

दिन में – ‘सत्यं त्वर्तेन परिषिञ्चामि’ रात्रि में – ‘ऋतं वा सत्येन परिपिञ्चामि’ इस मन्त्र से हाथ में जल लेकर निश्चय कर, घृत व्यञ्जैन युक्त अन्न का भोजन करे ॥ ४५ ॥

नैकवासाः सनश्नी यात्‌ स्वासने निजभाजने ॥ स्वयमासनमारुह्य स्वस्थचित्तः प्रसन्नधीः ॥ ४३ ॥

एक एव तु यो भुङ्क्तेत स्वकीये कांस्यभाजने ॥ चत्वारि तस्य वर्धन्त आयुः प्रज्ञा यशो बलम्‌ ॥ ४४ ॥

सत्यं त्वर्तेति मन्त्रेण जलमादाय पाणिना ॥ परिषिच्य च भोक्तव्यं सघृतं व्यञ्जनान्वितम्‌ ॥ ४५ ॥

भोजनात्‌ किञ्चिदन्नायग्रयमादायैवं समुच्चरेत्‌ ॥ नमो भूपतये पूर्वं भुवनपतये नमः ॥ ४६ ॥

भूतानां पतये पश्चा्द्धर्माय च ततो बलिम्‌ ॥ दत्त्वा च चित्रगुप्ताय भूतेभ्य इदमुच्चरेत्‌ ॥ ४७ ॥

यत्र क्कचन संस्थानां क्षुत्तृषोपहतात्मनाम्‌ ॥ भूतानां तृप्तयेऽक्षय्यमिदमस्तु यथासुखम्‌ ॥ ४८ ॥

भोजन में से कुछ अन्न लेकर इस प्रकार कहे – भूपतये नमः, प्रथम कहकर भुवनपतये नमः, कहे ॥ ४६ ॥

भूतानां पतये नमः, कह कर धर्मराज की बलि देवे फिर चित्रगुप्त को देकर भूतों को देने के लिये यह कहे ॥ ४७ ॥

जिस किसी जगह स्थित, भूख-प्यास से व्याकुल भूतों की तृप्ति के लिये यथासुख यह अक्षय्य अन्न हावे ॥ ४८ ॥

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