अध्याय २९

प्राणाय, अपानाय, व्यानाय, उदानाय बाद समानाय कहे ॥ ४९ ॥

प्रणव प्रथम उच्चातरण कर, अन्त में स्वाहा पद जोड़ कर घृत के साथ पाँच ग्रास जिह्वा से प्रथम निगल जाय, दाँतों से न दबावे ॥ ५० ॥

फिर तन्मय होकर प्रथम मधुर भोजन करे, नमक के पदार्थ और खट्टा पदार्थ मध्य में, कडुआ तीखा भोजन के अन्त में खाय ॥ ५१ ॥

प्राणायाऽपानसंज्ञाय व्यानाय च ततः परम्‌ ॥ उदानाय ततो ब्रूयात्‌ समानाय ततः परम्‌ ॥ ४९ ॥

प्रणवं पूर्वमुच्चायर्य स्वाहान्ते च घृतप्लुतम्‌ ॥ पञ्चकृत्वो ग्रसेदन्नंम जिह्वया न तु दंशयेत्‌ ॥ ५० ॥

ततश्च तन्मना भूत्वा भुञ्जीत मधुरं पुरः ॥ लवणाम्लौ तथा मध्ये कटुतिक्तौ ततः परम्‌ ॥ ५१ ॥

प्राग्द्रवं पुरुषोऽश्नीायान्मध्ये तु कठिनाशनम्‌ ॥ अन्ते पुनर्द्रवाशी तु बलरोग्ये न मुञ्चति ॥ ५२ ॥

अष्टौ ग्रासा मुनेर्भक्ष्याः षोडशारण्यवासिनः ॥ द्वात्रिंशच्च गृहस्थस्य त्वमितं ब्रह्मचारिणः ॥ ५३ ॥

नाद्याच्छास्त्रविरुद्धं तु भक्ष्यभोज्यादिकं द्विजः ॥ अभोज्यं प्राहुराहारं शुष्कं पर्युषितं तथा ॥ ५४ ॥

पुरुष प्रथम द्रव पदार्थ भोजन करे, मध्य में कठिन पदार्थ भोजन करे, अन्त में पुनः पतला पदार्थ भोजन करे तो बल और आरोग्य से रहित नहीं होता ॥ ५२ ॥

मुनि को आठ ग्रास भोजन के लिए कहा है। वानप्रस्थाश्रमी को सोलह ग्रास भोजन के लिये कहा है। गृहस्थाश्रमी को ३२ ग्रास भोजन कहा है और ब्रह्मचारी को अपरिमित ग्रास भोजन के लिये कहा है ॥ ५३ ॥

द्विज को शास्त्र के विरुद्ध भक्ष्य भोज्य आदि पदार्थों को नहीं खाना चाहिये। शुष्क और बासी पदार्थ को विद्वानों ने खाने के अयोग्य बतलाया है ॥ ५४ ॥

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