अध्याय ३

ऋषिगण बोले – हे महाभाग! नर के मित्र नारायण नारद के प्रति जो शुभ वचन बोले वह आप विस्तार पूर्वक हमसे कहें ॥ १ ॥

सूतजी बोले – हे द्विजसत्तमो! नारायण ने नारद के प्रति जो सुन्दर वचन कहे वह जैसे मैंने सुने हैं वैसे ही कहता हूँ आप लोग सुनें ॥ २ ॥

नारायण बोले – हे नारद! पहिले महात्मा श्रीकृष्णचन्द्र ने राजा युधिष्ठिर से जो कहा था वह मैं कहता हूँ सुनो ॥ ३ ॥

ऋषय ऊचुः ॥ नारायणो नरसखा यदुवाच शुभं वचः ॥ नारदाय महाभाग तन्नो वद सविस्तरम्‌ ॥ १ ॥

सूत उवाच ॥ नारायणवचो रम्यं श्रुयतां द्विजसत्तमाः ॥ यदुक्तं नारदायैतत्‌ प्रवक्ष्यामि यथाश्रुतम्‌ ॥ २ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्यामि यदुक्‍तं हरिणा पुरा ॥ राज्ञे युधिष्ठिरायैवं श्रीकृष्णेन महात्मना ॥ ३ ॥

एकदा धार्मिको राजाऽजातशत्रुर्युधिष्ठिरः ॥ द्यूते पराजितो दुष्टैकर्धार्तराष्ट्रै श्छ लप्रियैः ॥ ४ ॥

समक्षमग्निसम्भूता कृष्णा धर्मपरायणा ॥ दुःशासनेन दुष्‍टैन कचेष्वादाय कर्षिता ॥ ५ ॥

आकृष्टानि च वासांसि श्रीकृष्णेन सुरक्षिता ॥ पश्चाद्राज्यं प्रित्यज्य प्रयाताः काम्यकं वनम्‌ ॥ ६ ॥

एक समय धार्मिक राजा अजातशत्रु युधिष्ठिर, छलप्रिय धृतराष्ट्र के दुष्टपुत्रों द्वारा द्यूतक्रीड़ा में हार गये ॥ ४ ॥

सबके देखते-देखते अग्नि से उत्पन्न हुई धर्मपरायणा द्रौपदी के बालों को पकड़ कर दुष्ट दुःशासन ने खींचा ॥ ५ ॥

और खींचने के बाद उसके वस्त्र उतारने लगा तब भगवान् कृष्ण ने उसकी रक्षा की। पीछे पाण्डव राज्य को त्याग काम्यक वन को चले गये ॥ ६ ॥

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