अध्याय ३

वहाँ अत्यन्त क्लेश से युक्त वे वन के फलों को खाकर जीवन बिताने लगे। जैसे जंगली हाथियों के शरीर में बाल रहते हैं इसी प्रकार पाण्डवों के शरीर में बाल हो गये ॥ ७ ॥

इस प्रकार दुःखित पाण्डवों को देखने के लिये भगवान् देवकीसुत मुनियों के साथ काम्यक वन में गये ॥ ८ ॥

उन भगवान् को देखकर मृत शरीर में पुनः प्राण आ जाने की तरह युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन आदि प्रेमविह्वल होकर सहसा उठ खड़े हुए और प्रीति से श्रीकृष्ण के गले मिले ॥ ९ ॥

अत्यन्तं क्लेशमापन्नाः पार्था वन्यफलाशिनः ॥ विष्वक्कचाचिताः सर्वे राजा इव वनौकसः ॥ ७ ॥

अथ तान्‌ दुःखितान्‌ द्रष्‍टुं भगवान्‌ देवकीसुतः ॥ जगाम काम्यकवनं मुनिभिः परिवारितः ॥ ८ ॥

तं दृष्ट्वा सहसोत्तस्थुर्देहाः प्राणानिवागतान्‌ ॥ पार्थाः सम्वजिरे प्रीत्या श्रीकृष्णं प्रेमविह्वलाः ॥ ९ ॥

ते चानिनमतां भक्‍त्या हरिपदाम्बुजम्‌ ॥ द्रौपदी तं ननामाशु शनैः शनैरतन्द्रिता ॥ १० ॥

तान्‌ दृष्ट्वा दुःखितान्‌ पार्थान्‌ रौरवाजिनवाससः ॥ धूलिभिर्धूसरान्‌ रुक्षान्‌ सर्वतः कचसंयुतान्‌ ॥ ११ ॥

पाञ्चालीमपि तन्वङ्गीं तादृशीं दुखसंवृताम्‌ ॥ तेषां दुःखमतोवोग्रं दृष्‍ट्‌वैवातीत दुःखितः ॥ १२ ॥

और भगवान् कृष्ण के चरण कमलों में भक्ति से नमस्कार करते भये द्रौपदी धीरे-धीरे वहाँ आय आलस्यरहित होकर भगवान् को शीघ्र नमस्कार करती भई ॥ १० ॥

उन दुःखित पाण्डवों को रुरुमृग के चर्म के वस्त्रों को पहिरे देख और समस्त शरीर में धूल लगी हुई, रूखा शरीर, चारों तरफ बाल बिखरे हुए ॥ ११ ॥

द्रौपदी को भी उसी प्रकार दुर्बल शरीरवाली और दुःखों से घिरी हुई देखा। इस तरह दुःखित पाण्डवों को देखकर अत्यन्त दुःखी ॥ १२ ॥

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