अध्याय ३

भक्तवत्सल भगवान्‌ धृतराष्ट्र के पुत्रों को जला देने की इच्छा से उन पर क्रुद्ध हुए। विश्‍व के आत्मा, भाहों को चढ़ा गुरेर कर देखने वाले ॥ १३ ॥

करोड़ों काल के कराल मुख की तरह मुखवाले, धधकती हुई प्रलय की अग्नि के समान उठे हुए, ओठों को दाँत के नीचे जोर से दबाकर तीनों लोकों को जला देने की तरह ॥ १४ ॥

श्रीसीता के वियोग से सन्तप्त भगवान् रामचन्द्र को रावण पर जैसा क्रोध आया था उस प्रकार से क्रुद्ध भगवान् को देखकर काँपते हुए अर्जुन ॥ १५ ॥

धार्त्तराष्ट्रान्‌ दग्धुकामो भगवान्‌ भक्तवत्सलः ॥ चक्रे कोपं स विश्वात्मा भ्रूभङ्गकुटिलेक्षणः ॥ १३ ॥

कोटिकालकरालास्य-प्रलयाग्निरिवोत्थितः ॥ सन्दष्टौष्ठपुटः प्रोच्चेस्विलोकीं ज्वलयन्निव ॥ १४ ॥

सीतावियोगसन्तप्तः साक्षाद्दशरथिर्यथा ॥ तमालोक्य तदा वीरो बीभत्सुर्जातवेपथुः ॥ १५ ॥

उत्थाय कृष्णं तु्ष्टाव बद्धाञ्जलिपुटं भिया ॥ धर्मानुमोदितः शीघ्रं द्रौपद्या च तथापरैः ॥ १६ ॥

अर्जुन उवाच ॥ हे कृष्ण जगतां नाथ नाथ नाहं जगद्वहिः ॥ त्वमेव जगतां पाता मां न पासि कथं प्रभो ॥ १७ ॥

यच्चक्षुःणतनेनैव ब्रह्मणः पतनं भवेत्‌ ॥ किं तत्कोपेन न भवेत्‌ को वेद किं भविष्यति ॥ १८ ॥

कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए द्रौपदी, धर्मराज तथा और लोगों से भी अनुमोदित होकर शीघ्र ही हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ॥ १६ ॥

अर्जुन बोले – हे कृष्ण! हे जगत्‌ के नाथ! हे नाथ! मैं जगत् के बाहर नहीं हूँ। आपही जगत् की रक्षा करने वाले हैं, हे प्रभो! क्या मेरी रक्षा आप न करेंगे? ॥ १७ ॥

जिनके नेत्र के देखने से ही ब्रह्मा का पतन हो जाता है उनके क्रोध करने से क्या नहीं हो सकता है, यह कौन जानता है कि क्या होगा? ॥ १८ ॥

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