अध्याय ३

हे संहार करने वाले! क्रोध का संहार कीजिये। हे तात के पात! हे जगत्पते! आप ऐसे महापुरुषों के क्रोध से संसार का प्रलय हो जाता है ॥ १९ ॥

सम्पूर्ण तत्त्व को जानने वाले सर्व वस्तुओं के कारण के कारण, वेद और वेदांग के बीज के बीज आप साक्षात् श्रीकृष्ण हैं मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥ २० ॥

आप ईश्‍वर हैं इस चराचरात्मक संसार को आपने उत्पन्न किया है, सर्वमंगल के मांगल्य हैं और सनातन के बीजरूप हैं ॥ २१ ॥

क्रोधं संहर संहर्तस्ताततात जगत्पते ॥ त्वद्विधानां च कापेन जगतः प्रलयो भवेत्‌ ॥ १९ ॥

वन्दे त्वां सर्वतत्त्वज्ञं सर्वकारणकारणम्‌ ॥ वेदवेदांगबाजस्य बीजं श्रीकृष्णमीश्वरम्‌ ॥ २० ॥

त्वमीश्वरोऽसृजः सर्वं जगदेतच्चराचरम्‌ ॥ सर्वमङ्गलमाड्गल्यं बीजरूपः सनातनः ॥ २१ ॥

स कथं स्वकृतं हन्याद्विश्वमेकापराधतः ॥ मशकान्‌ भस्मासात्कर्तुं को वा दहति मन्दिरम्‌ ॥ २२ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इति विज्ञाप्य श्रीकृष्णं फाल्गुनः परवीरहा ॥ बद्धाञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणनाम जनार्दनम्‌ ॥ २३ ॥

सूत उवाच ॥ हरिः क्रोधं निरस्याशु सौम्योऽभूच्चन्द्रमा इव ॥ समालक्ष्य तदा सर्वे पाण्डवाः स्वास्थ्यमागताः ॥ २४ ॥

इसलिये एक के अपराध से अपने बनाए समस्त विश्‍व का आप नाश कैसे करेंगे? कौन भला ऐसा होगा जो मच्छरों को जलाने के लिये अपने घर को जला देता हो? ॥ २२ ॥

श्रीनारायण बोले – दूसरों की वीरता को मर्दन करने वाले अर्जुन ने भगवान् से इस प्रकार निवेदन कर प्रणाम किया ॥ २३ ॥

सूतजी बोले – श्रीकृष्णजी ने अपने क्रोध को शान्त किया और स्वयं भी चन्द्रमा की तरह शान्त होते भये। इस प्रकार भगवान्‌ को शान्त देखकर पाण्डव स्वस्थ होते भये ॥ २४ ॥

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