अध्याय ३

प्रेम से प्रसन्नमुख एवं प्रेमविह्नल हुए सबों ने भगवान् को प्रणाम किया और जंगली कन्द, मूल, फल आदि से उनकी पूजा की ॥ २५ ॥

नारायण बोले – तब शरण में जाने योग्य, भक्तों के ऊपर कृपा करने वाले श्रीकृष्ण को प्रसन्न जान, विशेष प्रेम से भरे हुए, नम्र ॥ २६ ॥

अर्जुन ने बारम्बार नमस्कार किया और जो प्रश्‍न आपने हमसे किया है वही प्रश्‍न उन्होंने श्रीकृष्ण से किया ॥ २७ ॥

प्रीत्युत्फुल्लमुखाः सर्वे प्रणेमुः प्रेमविह्वलाः ॥ श्रीकृष्णं पूजयाञ्चकुर्वन्यैर्मूलफलादिभिः ॥ २५ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ ततः प्रसन्नं श्रीकृष्णं शरण्यं भक्तवत्सलम्‌ ॥ विज्ञायावनतो भूत्वा बृहतोमपरिप्लुतः ॥ २६ ॥

बद्धाञ्जलिर्गुङाकेशो नामं नामं पुनः पुनः ॥ तं तथा कृतवान्‌ प्रश्‍नं यथा पृच्छति यं भवान्‌ ॥ २७ ॥

श्रुत्वैवं भगवान्‌ दध्यौ मुहुर्तं मनसा हरिः ॥ ध्यात्वाऽऽश्‍वास्य सुहृद्वर्गं पाञ्चालीं च धृतव्रताम्‌ ॥ उवाच वदतां श्रेष्ठः पाण्डवानां हितं वचः ॥ २८ ॥

श्रीकृष्ण उवाच ॥ श्रृणु राजन्‌ महाभाग वीभत्सो ह्यथ मद्वचः ॥ अपूर्वोऽयं कृतः श्‍नो नोत्तरं वक्‍तुमुत्सहे ॥ २९ ॥

एष गुह्यतरो लोके ऋषाणामपि दुर्घटः ॥ तथापि वक्ष्ये मित्रत्वाद्भक्तत्वाच्व तवार्जुन ॥ ३० ॥

इस प्रकार अर्जुन का प्रश्‍न सुनकर श्रीकृष्‍ण क्षणमात्र मन से सोचकर अपने सुहृद्वर्ग पाण्डवों को और व्रत को धारण की हुई द्रौपदी को आश्‍वासन देते हुए वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीकृष्ण पाण्डवों से हितकर वचन बोले ॥ २८ ॥

श्रीकृष्णजी बोले – हे राजन्‌! हे महाभाग! हे बीभत्सो! अब मेरा वचन सुनो। आपने यह प्रश्‍न अपूर्व किया है। आपको उत्तर देने में मुझे उत्साह नहीं हो रहा है। ॥ २९ ॥

इस प्रश्‍न का उत्तर गुप्त से भी गुप्त है ऋषियों को भी नहीं विदित है फिर भी हे अर्जुन! मित्र के नाते अथवा तुम हमारे भक्त हो इस कारण से हम कहते हैं ॥ ३० ॥

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