अध्याय ३

हे सुव्रत! वह जो उत्तर है वह अति उग्र है, अतः क्रम से सुनो! चैत्रादि जो बारह मास, निमेष, महीने के दोनों पक्ष, घड़ियाँ ॥ ३१ ॥

प्रहर, त्रिप्रहर, छ ऋतुएँ, मुहूर्त दक्षिणायन और उत्तरायण, वर्ष चारों युग, इसी प्रकार परार्ध तक जो काल है यह सब ॥ ३२ ॥

और नदी, समुद्र, तालाब, कुएँ, बावली, गढ़इयाँ, सोते, लता, औषधियों, वृक्ष, बाँस आदि पेड़ ॥ ३३ ॥

तदुत्तरमतीवोग्रं क्रमतः श्रृणु सुव्रत ॥ मध्वादयश्च ये मासा लवपक्षाश्च नाडिकाः ॥ ३१ ॥

यामास्त्रियामा ऋतवो मुहूर्तान्ययने उभे ॥ हायनं च युगान्येवं परार्धान्ता परे च ये ॥ ३२ ॥

नद्योऽर्णवहृदाः कूपा वापीपल्वलनिर्झराः ॥ लतौषधिद्रुमाश्चैव त्वक्‌साराः पादपाश्च ये ॥ ३३ ॥

वनस्पतिपुरग्रामगिरयः पत्तनानि च ॥ एते सवे मूतिमन्तः पूज्यन्ते स्वात्मनो गुणैः ॥ ३४ ॥

न तेषां कश्चिदप्यस्ति ह्यपूर्वः स्वामिवर्जुतः ॥ स्वे स्वेऽधिकारे सततं पूजयन्ते फलदायिनः ॥ ३५ ॥

स्वस्वामियोगमाहात्म्यात्‌ सर्वे सौभाग्यशालिनः ॥ अधिमासः समुत्पन्नः कदाचित्‌ पाण्डुनन्दन ॥ ३६ ॥

वन की औषधियाँ, नगर, गाँव, पर्वत, पुरियाँ ये सब मूर्तिवाले हैं और अपने गुणों से पूजे जाते हैं ॥ ३४ ॥

इनमें ऐसा कोई अपूर्व व्यक्ति नहीं है जो अपने अधिष्ठातृ देवता के बिना रहता हो, अपने अपने अधिकार में पूजे जाने वाले ये सभी फल को देने वाले हैं ॥ ३५ ॥

अपने-अपने अधिष्ठातृ देवता के योग के माहात्म्य से ये सब सौभाग्यवान् हैं। हे पाण्डुनन्दन! एक समय अधिमास उत्पन्न हुआ ॥ ३६ ॥

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