अध्याय ३

उस उत्पन्न हुए असहाय निन्दित मास को सब लोग बोले कि यह मलमास सूर्य की संक्रान्ति से रहित है अतः पूजने योग्य नहीं है। ॥ ३७ ॥

यह मास मलरूप होने से छूने योग्य नहीं है और शुभ कर्मों में अग्राह्य है इस प्रकार के वचनों को लोगों के मुख से सुनकर यह मास निरुद्योग, प्रभारहित ॥ ३८ ॥

दुःख से घिरा हुआ, अति खिन्नमन, चिन्ता से ही ग्रस्तमन होकर व्यथित हृदय से मरणासन्न की तरह हो गया। फिर वह धैर्य धारण कर मेरी शरण में आया ॥ ३९ ॥

तमूचुः सकला लोका असहायं जुगुप्सितम्‌ ॥ अनर्हो मलमासोऽयं रविसङ्कमवर्जितः ॥ ३७ ॥

अस्पृश्यो मलरूपत्वाच्छुभे कर्मणि गर्हितः ॥ श्रुत्वैतद्वचनं लोकान्निरुद्योगो हतप्रभः ॥ ३८ ॥

दुःखान्वितोऽतिखिन्नात्मा चिन्ताग्रस्तैकमानसः ॥ मुमूर्षरभवत्तेन हृदयेन विदूयता ॥ पश्चाद्धैर्यं समालम्ब्य मामसौ शरणं गतः ॥ ३९ ॥

प्राप्तो वैकुण्‍ठभवनं यत्राहमवसं नर ॥ अन्तर्गृहं समागत्य मामसौ दृष्टवान्‌ परम्‌ ॥ ४० ॥

अमूल्यरत्‍नरचिते हेमसिंहासने स्थितम्‌ ॥ तदानीं मामसौ दृष्ट्वा दण्‍डवत्‌ पतितो भुवि ॥ ४१ ॥

प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा मुञ्चन्नश्रूणि नेत्रतः ॥ वाचा गद्‌गदया सौम्यं बभाषे धैर्यमुद्वहन्‌ ॥ ४२ ॥

हे नर! वैकुण्ठ भवन में जहाँ मैं रहता था वहाँ पहुँचा और मेरे घर में आकर मुझ परम पुरुषोत्तम को इसने देखा ॥ ४० ॥

उस समय अमूल्य रन्तों से जटित सुवर्ण के सिंहासन पर बैठे मुझको देखकर यह भूमि पर साष्टांग दण्डवत् कर ॥ ४१ ॥

हाथ जोड़कर नेत्रों से बराबर आँसुओं की धारा बहाता हुआ धैर्य धारण कर गद्‌गद वाणी से बोला ॥ ४२ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8