अध्याय ३

सूतजी बोले – इस प्रकार महामुनि बदरीनाथ कथा कहकर चुप होते भये। इस प्रकार नारायण के मुख से कथा सुन भक्तों के ऊपर दया करने वाले नारदमुनि पुनः बोले ॥ ४३ ॥

सूत उवाच ॥ इत्युक्‍त्वा बदरीनाथो विरराम महामुनिः ॥ तच्छ्रुत्वा पुनरेवाह नारदो भक्तवत्सलः ॥ ४३ ॥

नारद उवाच ॥ इत्यं गत्वा भवनममलं पूर्णरूपस्य विष्‍णोर्भक्तिप्राप्यं जगदघहरं योगिनामप्यगम्यम्‌ ॥ यत्रैवास्ते जगदभयदो ब्रह्मरूपो मुकुन्दस्तत्पादाब्जं शरणमधिगतः सोऽधिमासः किमूचे ॥ ४४ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्येऽधिमासस्य वैकुण्ठमापणं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

नारद बोले – इस प्रकार अपनी पूर्ण कला से विराजमान भगवान् विष्णु के निर्मल भवन में जाकर भक्ति द्वारा मिलने वाले, जगत् के पापों को दूर करने वाले, योगियों को भी शीघ्र न मिलने वाले जगत् को अभयदान देने वाले, ब्रह्मरूप, मुकुंद जहाँ पर थे उनके चरण कमलों की शरण में आया हुआ अधिमास क्या बोला? ॥ ४४ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

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