अध्याय ३०

नारदजी बोले – हे तपोनिधे! तुमने पहले पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा की है अब आप उनके सब लक्षणों को मुझसे कहिये ॥ १ ॥

सूतजी बोले – हे पृथिवी के देवता ब्राह्मणो! इस प्रकार नारद मुनि के पूछने पर स्वयं प्राचीन मुनि नारायण ने पतिव्रता स्त्री के लक्षणों को कहा ॥ २ ॥

श्रीनारायण बोले – हे नारद! सुनो मैं पतिव्रताओं के उत्तम व्रत को कहता हूँ। पति कुरूप हो, कुत्सित व्यवहारवाला हो, अथवा सुरूपवान्‌ हो ॥ ३ ॥

नारद उवाच ॥ स्तुता पतिव्रता नारी त्वया पूर्वं तपोनिधे ॥ तल्लक्षणानि सर्वाणि समासेन वदस्व मे ॥ १ ॥

सूत उवाच ॥ नोदितो नारदेनेत्थं पुरातनमुनिः स्वयम्‌ ॥ पतिव्रतायाः सर्वाणि लक्षणान्याह भूसुराः ॥ २ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्यामि सतीनां व्रतमुत्तमम्‌ ॥ कुरूपो वा कुवृत्तो वा सुखभावोऽथ वा पतिः ॥ ३ ॥

रोगान्वितः पिशाचो वा क्रोधनो वाऽथ मद्यपः ॥ वृद्धो वाऽप्यविदग्धो वा मूकोऽन्धो बधिरोऽपि वा ॥ ४ ॥

रौद्रो वाऽथ दरिद्रो वा कदर्यः कुत्सितोऽपि वा ॥ कातरः कितवो वाऽपि ललनालम्पटोऽपि वा ॥ ५ ॥

सततं देववत्‌ पूज्यः साध्व्या वाक्कायकर्मभिः ॥ न जातु विषमं भर्तुः स्त्रिया कार्यं कथञ्चन ॥ ६ ॥

रोगी हो, पिशाच हो, क्रोधी हो, मद्यपान करनेवाला हो, मूर्ख हो, मूक हो, अन्धा हो अथवा बधिर हो ॥ ४ ॥

भयंकर हो, दरिद्र हो, कुपण हो, निन्दित हो, दीन हो, अन्य स्त्रियों में आसक्त हो ॥ ५ ॥

परन्तु सती स्त्री सदा वाणी, शरीर, कर्म से पति का देवता के समान पूजन करे। कभी भी स्त्री पति के साथ कठोर व्यवहार नहीं करे ॥ ६ ॥

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