अध्याय ३०

श्वसुर-सास के पास शयन करे, अन्यत्र शयन न करे और प्रतिदिन प्रयत्नोपूर्वक पति के समाचार की खोज लेती रहे ॥ ५५ ॥

पति के कल्याण समाचार मिलने के लिये दूत को भेजे और प्रसिद्ध देवताओं के समीप मांगलिक याचना करे ॥ ५६ ॥

पति के परदेश जाने पर पतिव्रता इस प्रकार के कार्यों को करे। अंगों को न धोना, मलिन वस्त्र को धारण करना ॥ ५७ ॥

श्वश्रूश्वशुरयोः पार्श्बे निद्रा कार्या न चान्यतः ॥ प्रत्यहं पतिवार्ता च तयाऽन्वेष्या प्रयत्न तः ॥ ५५ ॥

दूताः प्रस्थापनीयाश्च पत्युः क्षेमोपलब्धये ॥ देवतानां प्रसिद्धानां कर्त्तव्यमुपयाचनम्‌ ॥ ५६ ॥

एवमादि विधातव्यं सत्या प्रोषितकान्तया ॥ अप्रक्षालनमङ्गानां मलिनाम्बरधारणम्‌ ॥ ५७ ॥

तिलकाञ्जनहीनत्वं गन्धमाल्यविवर्जनम्‌ ॥ नखरोम्णामसंस्कारो दशनानाममार्जनम्‌ ॥ ५८ ॥

उच्चैञर्हासः परैर्नर्म परचेष्टाविचिन्तनम्‌ ॥ स्वेच्छापर्यटनं चैव परपुंसाङ्गमर्दनम्‌ ॥ ५९ ॥

अटनं चैकवस्त्रेण निर्लज्ज्त्वं यथा गतिः ॥ इत्यादिदोषाः कथिता योषितां नित्यदुःखदा ॥ ६० ॥

तिलक न लगाना, आँजन न लगाना, सुगन्धित पदार्थ माला आदि का त्याग, नख, बाल का संस्कार न करना, दाँतों में मिस्सौ आदि नहीं लगाना ॥ ५८ ॥

ऊँचे स्वर से हँसना, दूसरे से हँसी, दूसरे की चाल व्यवहार का विशेष रूप से चिन्तन करना, स्वच्छन्द भ्रमण करना, दूसरे पुरुष के अंगों का मर्दन करना ॥ ५९ ॥

एक वस्त्र से घूमना, लज्जा  रहित (उतान) होकर चलना, इत्यादि दोष स्त्रियों को अत्यन्त दुःख देने वाले कहे गये हैं ॥ ६० ॥

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