अध्याय ३०

गृह में कार्यों को करके हरदी लेपन से और शुद्ध जल से शरीर को शुद्ध कर स्वच्छ श्रृंगार को करे ॥ ६१ ॥

खिले हुए कमल के समान प्रसन्न मुख होकर पति के समीप जाय, स्त्री के इस व्यवहार से युक्त और मन, वचन, शरीर से युक्त स्त्री ॥ ६२ ॥

पति से बुलाई जाने पर गृह के कार्यों को छोड़कर शीघ्र पति के पास जाय और कहे कि हे स्वामिन्‌! किस लिये बुलाया है कृपा पूर्वक कहें ॥ ६३ ॥

निर्वृत्य गृहकार्याणि हरिद्रालेपनस्तनुम्‌ ॥ प्रक्षाल्य शुचितोयेन कुर्यान्मण्डनमुज्व्और लम्‌ ॥ ६१ ॥

समीपं प्रेयसो गच्छेद्विकसन्मुखपङ्कजा ॥ अनेन नारीवृत्तेन मनोवाग्देहसंयुता ॥ ६२ ॥

आहूता गृहकार्याणि त्यक्त्वा गच्छेच्चङ सत्वरम्‌ ॥ किमर्थंव्याहृता स्वामिन्‌ सम्प्रसादो विधीयताम्‌ ॥ ६३ ॥

मा चिरं तिष्ठतां द्वारि न द्वारमुपसेवयेत्‌ ॥ स्वामिप्रत्यर्पितं किञ्चित्कस्मैचिन्न ददात्यपि ॥ ६४ ॥

सेवयेद्भर्तुरुच्छिष्टमिष्ठमन्नफलादिकम्‌ ॥ महाप्रसाद इत्युक्त्वा मोदमाना निरन्तरम्‌ ॥ ६५ ॥

सुखसुप्तं् सुखासीनं रममाणं यदृच्छया ॥ आतुरेष्वपि कार्येषु पतिं नोत्थापयेत्‌ क्कचित्‌ ॥ ६६ ॥

द्वार पर अधिक समय तक खड़ी न होवे। द्वार का सेवन न करे, स्वामी से मिली हुई चीज दूसरे को कभी न देवे ॥ ६४ ॥

पति के उच्छिष्ट मीठा, अन्न, फल आदि को यह महाप्रसाद है यह कहकर निरन्तर प्रसन्न रहे ॥ ६५ ॥

सुख से सोये, सुख से बैठे, स्वेच्छा से रमण करते हुए और आतुर कार्यों में पति को नहीं उठावे ॥ ६६ ॥

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