अध्याय ३०

अकेली कहीं न जाय, नग्न होकर स्नान न करे, पति से द्वेष करने वाली स्त्री को पतिव्रता न समझे ॥ ६७ ॥

उलूखल, मूसल झाड़ू, पत्थर, यन्त्र, देहली पर पतिव्रता कभी भी न बैठे ॥ ६८ ॥

तीर्थ में स्नान की इच्छा करने वाली स्त्री पति के चरणजल को पीवे, स्त्री के लिये शंकर से भी अथवा विष्णु भगवान्‌ से भी अधिक पति ही कहा गया है ॥ ६९ ॥

नैकाकिनी क्कचिद्गच्छेन्न नग्ना स्नानमाचरेत्‌ ॥ भर्तृविद्वेषिणीं नारीं साध्वीं नो भावयेत्क्क चित्‌ ॥ ६७ ॥

नोलूखले न मुसले न वधिन्यां दृषद्यपि ॥ न यन्त्रकेऽपि देहल्यां सती चिपविशेत्क्कदचित्‌ ॥ ६८ ॥

तीर्थस्नानार्थिनी नारी पतिपादोदकं पिबेत्‌ ॥ शङ्करादपि विष्णोर्वा पतिरेवाधिकः स्त्रियाः ॥ ६९ ॥

व्रतोपवासनियमं पतिमुल्लिङ्घय याऽऽचरेत्‌ ॥ आयुष्यं हरते भर्तुर्मृता नरकमिच्छति ॥ ७० ॥

उक्ता प्रत्युत्तरं दद्याद्या नारी क्रोधतत्परा ॥ नूनं सा जायते ग्रामे श्रृगाली निर्जने बने ॥ ७१ ॥

स्त्रीणां हि परमश्चैदका नियमः समुदाहृतः ॥ अभ्यर्च्य भर्त्तुरश्चरणौ भोक्तव्यं च सदा स्त्रिया ॥ ७२ ॥

जो स्त्री पति का वचन न मानकर व्रत उपवास नियमों को करती है वह पति के आयुष्य का हरण करती है और मरने के बाद नरक को जाती है ॥ ७० ॥

किसी कार्य के लिये कहीं जाने पर, जो स्त्री क्रोध कर पति के प्रति जवाब देती है वह ग्राम में कुतिया होती है और निर्जन वन में सियारिन होती है ॥ ७१ ॥

स्त्रियों के लिये एक ही उत्तम नियम कहा गया है कि स्त्री सदा पति के चरणों का पूजन करके भोजन करे ॥ ७२ ॥

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