अध्याय ३०

जो स्त्री पति का त्याग कर अकेली मिठाई खाती है वह वृक्ष के खोंड़रे में सोने वाली क्रूर उलूकी होती है ॥ ७३ ॥

जो स्त्री पति का त्याग कर अकेली एकान्त में फिरती है वह ग्राम में सूकरी होती है अथवा अपनी विष्ठा को खाने वाली गोह होती है ॥ ७४ ॥

जो स्त्री पति को हुँकार कह कर अप्रिय वचन बोलती है वह मूक अवश्य होती है, जो अपनी सौत के साथ सदा ईर्ष्या करती है वह दूसरे जन्म में दुर्भगा होती है ॥ ७५ ॥

या भर्तारं परित्यज्य मिष्टमश्नागति केवलम्‌ ॥ उलूकी जायते क्रूरा वृक्षकोटरशायिनी ॥ ७३ ॥

या भर्तारं समुत्सृज्य रहश्चरति केवलम्‌ ॥ ग्रामे वा सूकरी भूयाद्वल्गुली वा श्वविड्‌भुजा ॥ ७४ ॥

या हुंकृत्याप्रियं ब्रूते सा भूका जायते खलु ॥ या सतत्नीं  सदेर्ष्येत दुर्भगा साऽन्यजन्मनि ॥ ७५ ॥

दृष्टिं विलुप्य भर्तुर्या कञ्चिदन्यं समीक्षते ॥ काणा वा विमुखी चापि कुरूपा चैव जायते ॥ ७६ ॥

बाह्यादागतमालोक्य त्वरिता च जलासनैः ॥ ताम्बूलैर्व्यजनैश्चैव पादसंवाहनादिभिः ॥ ७७ ॥

अतिप्रियतरैर्वाक्यैर्भर्त्तारं या सुसेवते ॥ पतिव्रताशिरोरत्नंै सा नारी कथिता बुधैः ॥ ७८ ॥

जो स्त्री पति की दृष्टि बचा कर किसी दूसरे पुरुष को देखती है वह कानी होती है अथवा विमुखी और कुरूपा होती है ॥ ७६ ॥

जो स्त्री पति को बाहर से आया हुआ देखकर जल्दी से जल, आसन, ताम्बूल, व्यंजन, पैर को दबाना आदि ॥ ७७ ॥

अत्यन्त प्रिय वचनों से पति की सेवा करती है वह स्त्री पतिव्रताओं में शिरोरत्नअ के समान पण्डितों से कही गई है ॥ ७८ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17