अध्याय ३०

पति देवता हैं, पति गुरु हैं, पति धर्म तीर्थ व्रत है, इसलिये सबका त्याग कर एक पति का ही पूजन करे ॥ ७९ ॥

जिस तरह जीव से हीन देह क्षण भर में अशुचि हो जाता है उसी प्रकार पति से हीन स्त्री अच्छी तरह स्नान करने पर भी सदा अपवित्र है ॥ ८० ॥

सब अमंगल वस्तुओं की अपेक्षा विधवा स्त्री अत्यन्त अमंगल है, विधवा स्त्री के दर्शन से कभी भी कार्य-सिद्धि नहीं होती है ॥ ८१ ॥

भर्त्ता देवो गुरुर्भर्त्ता धर्मतीर्थव्रतानि च ॥ तस्मात्सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्‌ ॥ ७९ ॥

जीवहीनो यथा देहः क्षणादशुचितां व्रजेत्‌ ॥ भर्तुहीना तथा योषित्‌ सुस्नाताऽप्यशुचिः सदा ॥ ८० ॥

अमङ्गलेभ्यः सर्वेभ्यो विधवा ह्यत्यमङ्गला ॥ विधवादर्शनात्सिद्धिजार्तु क्कापि न जायते ॥ ८१ ॥

विहाय मातरं चैकामाशीर्वादप्रदायिनीम्‌ ॥ अन्याशिषमपि प्राज्ञात्यजेदाशीविषोपमाम्‌ ॥ ८२ ॥

कन्यां विवाहसमये वाचयेयुरिति द्विजाः ॥ भर्तुः सहचरी भूयाञ्जीवतोऽजीवतोऽपि वा ॥ ८३ ॥

तस्माद्भर्ताऽनुयातव्यो देहवच्छायया स्वया ॥ एवंसत्यासदा स्थेयं भक्त्या पत्यनुकूलया ॥ ८४ ॥

आशीर्वाद को देने वाली एक माता को छोड़ कर दूसरी स्त्री के आशीर्वाद को भी सर्प के समान त्याग देवे ॥ ८२ ॥

ब्राह्मण लोग विवाह के समय कन्या से इस प्रकार कहलाते हैं कि पति के जीवित तथा मृत दशा में सहचारिणी हो ॥ ८३ ॥

इसलिये अपनी छाया के समान पति का अनुगमन करना चाहिये। इस प्रकार पतिव्रता स्त्री को भक्ति से सदा पति के अनुकूल होकर रहना चाहिये ॥ ८४ ॥

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