अध्याय ३०

जिस प्रकार सर्प को पकड़ने वाला बलपूर्वक बिल से सर्प को निकाल लेता है उसी प्रकार सती स्त्री यमदूतों से छुड़ा कर पति को स्वर्ग ले जाती है ॥ ८५ ॥

यमराज के दूत दूर से ही पतिव्रता स्त्री को देखकर पापकर्म करने वाले भी उसके पतित पति को छोड़कर भाग जाते हैं ॥ ८६ ॥

जितनी अपने शरीर में रोम की संख्या है उतने दश कोटि वर्ष पर्यन्त पतिव्रता स्त्री पति से साथ रमण करती हुई स्वर्ग सुख को भोगती है ॥ ८७ ॥

व्यालग्राही यथा व्यालं बिलादुद्धरते बलात्‌ ॥ एवमुत्क्रम्य दूतेभ्यः पतिं स्वर्गं नयेत्सती ॥ ८५ ॥

यमदूताः पलायन्ते सतीमालोक्य दूरतः ॥ अपि दुष्कृतकर्माणुमुत्सृज्य पतितं पतिम्‌ ॥ ८६ ॥

यावत्स्वलोमसंख्यास्ति तावत्कोटययुतानि च ॥ भर्त्रास्वर्गसुखं भुङ्क्ते रममाणा पतिव्रता ॥ ८७ ॥

शीलभङ्गेनदुर्वृत्ताः पातयन्ति कुलद्वयम्‌ ॥ पितुः कुलं तथा पत्युरिहामुत्र च दुःखिताः ॥ ८८ ॥

अनुयाति न भर्तारं यदि दैवात्कथञ्चन ॥ तत्रापि शीलं संरक्ष्यं शीलभङ्गात्पतत्यधः ॥ ८९ ॥

तद्वैगुण्यात्पितास्वर्गात्पतिः पतति नान्यथा ॥ विधवाकबरीबन्धो भर्तुर्बन्धाय जायते ॥ ९० ॥

दुष्ट व्यवहार वाली स्त्रियाँ शील का नाश कर दोनों कुलों को डुबा देती हैं और इस लोक में तथा परलोक में दुःखित रहती हैं ॥ ८८ ॥

यदि दैववश पति के पीछे पति का अनुगमन नहीं करती हैं तो उस दशा में भी शील की रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि शील को तोड़ने से नरकगामिनी होती है ॥ ८९ ॥

स्त्री-दोष से पिता और पति स्वर्ग से गिर जाते हैं। विधवा स्त्री का कबरीबन्धन पति के बन्धन के लिये होता है ॥ ९० ॥

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