अध्याय ३०

विधवा स्त्री सर्वदा शिर के बालों को मुड़ा देवे, एक बार भोजन करे, कभी भी दूसरी बार भोजन नहीं करे ॥ ९१ ॥

खाट पर सोने वाली विधवा स्त्री अपने पति को नीचे गिरा देती है इसलिये पति के सुख के लिये पृथिवी पर सोवे ॥ ९२ ॥

अंगों में उबटन नहीं लगावे और ताम्बूल को न खाय, सुगन्ध का सेवन विधवा न करे ॥ ९३ ॥

शिरसो वपनं कार्यं तस्माद्विधवया सदा ॥ एकाहारः सदा कार्यो न द्वितीयः कदाचन ॥ ९१ ॥

पर्यङ्कशायिनी नारी विधवा पातयेत्‌ पतिम्‌ ॥ तस्माद्‌भूशयनं कार्यं पतिसौख्यसमीहया ॥ ९२ ॥

नैवाङ्गोद्वर्तनं कार्यं न ताम्बूलस्य भक्षणम्‌ ॥ गन्धद्रव्यस्य सम्भोगो नैव कार्यस्तया क्कचित्‌ ॥ ९३ ॥

तर्पणं प्रत्यहं कार्यं भर्तुः कुशतिलोदकैः ॥ तत्पितुस्तत्पितुश्चा॥पि नामगोत्रादिपूर्वकम्‌ ॥ ९४ ॥

श्वेणतवस्त्रं सदा धार्यमन्यथा रौरं व्रजेत्‌ ॥ इत्येवं नियमैर्युक्ता विधवाऽपि पतिव्रता ॥ ९५ ॥

प्रतिदिन कुश तिल जल से पति का तर्पण करे और पति के पिता का तथा उनके पिता का नाम गोत्र कहकर तर्पण करे ॥ ९४ ॥

सदा श्वे त वस्त्र धारण करे ऐसा न करने से रौरव नरक को जाती है। इस प्रकार नियमों से युक्त विधवा स्त्री पतिव्रता है ॥ ९५ ॥

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